चैताली सिन्हा ‘अपराजिता’ की कविता ‘ललछाई सी धूप और ललमुनिया !’


चैताली सिन्हा ‘अपराजिता’

ललमुनिया चल पड़ी है
ललछाई हुई धूप की ओर
जहाँ से दीखता है नदी का
चमकता हुआ
छिछलेदार पानी,
उसका सुफेदनुमा रंग

ललमुनिया अक्सर दौड़ जाती है
उस मुहाने पर,
जहाँ बैठकर करती है वह बातें,
उस अजनबी नदी से
घंटों और पहरों एकटक…!
करती रहती है मुआयना,
उसकी बहती जलधारा का
करती रहती है खिटिर-पिटिर
अपनी तोतली बोली में,
ललमुनिया ललछाई धूप की तरह
लाल है कोमल गुलाब की पंखुड़ियों सी
पहाड़ों की हंसी वादियों में ललमुनिया
का रंग और भी दमकने लगता है
जैसे ढलते हुए सूरज की रोशनी
अचानक हो उठता है लाल

ललमुनिया अपनी भेड़ों के साथ
उसी अस्त होते सूरज की लालिमा के साथ
लौट आती है पहाड़ी कंदराओं में,
जहाँ जाकर उसकी आवाज़
ऐसे गुम हो जाती है, जैसे कोई
अदृश्य जगत् में विलीन होता हो…!

हर रोज़ ललमुनिया
यूँ ही घुमक्कड़ी करती फ़िरती
नदी, नाले, पर्वत, पहाड़,
जंगल और पशु-पक्षियों के साथ
अपने आत्म का विवरण वो उन्हीं को देतीं
ललमुनिया की कोई दोस्त नहीं,
जो हैं यही हैं – टिट्टू, चीकर, बिंशू, मौरी
गिल्लू, घीवा और राती…!
ललमुनिया बहुत खुश रहती थी इनके साथ

मगर आज वह बहुत उदास है,
ललमुनिया के सभी मित्र बेसुध होकर
गिरे पड़े हैं…!
केवल टिट्टू की आँखें थोड़ी
खुली हुई है, लेकिन देह निढाल;
निःशक्त…फिर भी वह देख रहा था
ललमुनिया की ललछाई हुई धूप की आगोश में
लुटती हुई अस्मिता को,
वहशी दरिंदे के हाथ
एक-एक कर नोच रहे थे
ललमुनिया की देह को,
उसकी आत्मा को,
उसकी मासूम सी मुस्कान को
उसकी कोमल, नाज़ुक किसलय डाल को
सूरज अपनी ललछाई हुई धूप के साथ
तैरता हुआ डूब रहा था
ठीक उसी तरह
जिस तरह ललमुनिया की नब्ज़
धीरे-धीरे डूब रही थी…!
ललमुनिया भी सूरज की ललछाई
धूप की तरह ओझल हो गई…!

चैताली सिन्हा ‘अपराजिता’ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी की शोधार्थी हैं। कविताओं के अलावा वे चिंतनपरक आलेख भी लिखती है और मेरा रंग की नियमित लेखिका हैं। 


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