अरुण कुमार की कुछ कविताएं : ‘भीड़’, ‘कठपुतलियां’ और ‘नीला रंग’

अरुण कुमार की कविताएं

दलित लेखन में सक्रिय युवा रचनाकार और आलोचक अरुण कुमार की कविताओं में एक किस्म का तीखापन और तेवर देखने को मिलता है। देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अरुण कुमार के लेख, समीक्षा और कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे चर्चित जनपक्षधर पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ के पूर्व उपसंपादक भी रह चुके हैं। ‘गाँव के लोग’ पत्रिका के दलित विशेषांक के अतिथि संपादन का भी दायित्व निभाया है। उनके द्वारा संपादित पुस्तकें हैं- ‘असंगघोष का काव्य संसार’ और ‘दलित साहित्य :चुनौतियाँ एवं चिंतन’ (प्रेस में)। प्रस्तुत है उनकी तीन कविताएं।

भीड़

जाने कब उसने
ग को गाय में बदल दिया।
मैं क से कानून कहता रहा
मगर
भ से बनी भीड़
ने रौंद डाले,
तरबेज के सपने,
अखलाक का वजूद,
पहलू खान का घर,
और
ह से बनी हिंसा में
शरीक होते गए तमाम
त से बने तमाशबीन
द से बने संवेदनहीन दर्शक।
वो भीड़
म से अपना मनोबल बढ़ाती रही,
समय के ये क्रूर हत्यारे,
भीड़ की शक्ल में दरअसल
चरमपंथ के नुमाइंदे थे।
जो
गढ़ रहे थे
साम्प्रदायिकता की नई परिभाषा,
बदल रहे थे
सेक्युलर राष्ट्र की वर्णमाला।
अफसोस, इस बात का नहीं कि
भीड़ थी,
अफ़सोस इस बात का था
कि इस भीड़ के खिलाफ
मैं खामोश था।

कठपुतलियां

अपने ही धागों में
उलझी हुई कठपुतलियां,
सत्ता के शोषण तंत्र में
उलझी सी कठपुतलियां,
तलाश रही है अपना वजूद,
अपनी अस्मिता,
अपनी पहचान।
वर्षों तक मनोरंजन के सागर में
जिन्होंने लगवाई भी डुबकियां,
तकनीक के दौर में, आज
खोने लगी हैं अपनी पहचान।
तभी तो
कठपुतली कॉलोनी
आ गई सत्ता के
निशाने पर,
भ्रष्ट तंत्र में नहाए बुलडोजर,
रहेजा के नशे में डूबी खाकी,
ढहा रहे थे कहर,
बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं
बेबस थे सरकारी लाठी के आगे,
उनका करूण स्वर, उनकी चीत्कार
दब गए थे सरकारी कोलाहल में,
सत्ता और पूँजीवाद के, भ्रष्ट गठजोड़ ने
नंगे नाच ने,
पल में ही धराशायी कर डाले
मकान आशाओं के,
महल सपनों के।
पसरा हुआ था मलबा वहाँ
जीवन की उमंगों का,
समेट रही थी कठपुतलियां
मलबे के ढेर में
बचे खुचे जीवन को।
शासन के इस करतब पर
हँस रहे थे लोग,
और रो रही थी
कठपुतलियां।

नीला रंग

बहुत दिनों तक
रंगी रही
घर की दीवारें
हरी, सफेद और केसरिया
वो दीवारें
जिन्होंने
मिलकर बनाया था
घर को घर
पिछले कई सालों में
आज
एक-एक दीवार पर
कब्जा
हर रंग का
मार-काट
दंगे-फसाद
मॉब लिंचिंग
हेट स्पीच
से सजी दीवारों से त्रस्त
मैं
रंग देना चाहता हूँ
सभी दीवारें को
नीले रंग से
ताकि
घर
बचा सकूं।।