अर्पण जम्वाल : कुछ कविताएं, कुछ क्षणिकायें और कुछ अशआर

Arpan Jamwal

अर्पण जम्वाल की कविताएँ संवेदना के स्तर पर न सिर्फ उनकी रचनाशीलता के प्रति आश्वस्त करती हैं बल्कि एक कवि के रूप में स्त्री मन के भीतर बहुत सारी परतों में दबे उस संसार को भी सामने लाती हैं, जिन्हें हमारे समाज में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर अपर्ण नेहरू युवा केंद्र की सामाजिक कार्यकर्ता भी रह चुकी हैं और युवा सेवाओं तथा खेल विभाग की पूर्व ब्लॉक युवा समन्वयक भी रही हैं।

छुपााना खुद को 

मछली छुपती है,
गहरे पानी की तलहटी में।
वो सवयं को बचाना चाहती है,
कांटे में लगे उस चारे से।
जो उसे मृत्यु की और,
खींच कर ले जाता है।

स्त्रियां छुपती हैं,
मांग के सिन्दूर,
गले में पहने मंगलसूत्र की ओट में,
वो बचाना चाहती हैं सवयं को हवस भरी गन्दी नज़रों से,
जो उन्हें दूर से ही छू कर मलिन करती हैं।

लड़कियां छुपाती हैं खुद को सूरज की रौशनी में घर के किवाड़ों के पीछे,
वो बचाना चाहती हैं स्वयं को अंधेरों में चमकती,
उन भेड़ियों की आँखों से,
जो अँधेरे में अवसर पाकर उन्हें गोश्त की तरह नोच लेना चाहतें हैं।

नन्ही बच्चियां लिपट  जाती हैं माँ के पल्लू से,
वो बचाना चाहतीं हैं स्वयं को उन प्रलोभनों से,
जिन्हेँ दिखाकर हैवान वहलाने फुसलाने की कोशिश में रहते हैं।

स्त्री और उसके समस्त पर्याय सवयं को बचाना चाहते हैं,
सभ्य समाज के सभ्य पुरुष की असम्वेदनायों और उसकी असभ्यताओं से ।

 

आईने में कैद

रोज़ आती है एक चिड़िया,
बालकनी में लगे आईने में,
देखकर  अपना ही अक्स।
वदहवास सी अनेकों बार
जोर जोर से मरती चोंच।
उसे लगता है कोई मुझ सा,
कैद हैं इस आईने में।
वो करती अनवरत प्रयास,
उसे छुड़ाने का, आज़ाद कराने का।
भ्रम में जकड़ी उसकी संवेदनाएं,
कहीं बेहतर हैं, सवार्थ में जकड़े हुए,
उस मनुष्य से, जिसकी संवेदनाएं मर चुकी हैं।

 

कुछ क्षणिकायें 

एक

मैं शब्द हूँ
मुझे शब्द हे रहने दो
मत बनाओ मुझे किसी कमान के तीर का प्रखर प्रहार
जो भेद जाये किसी के अंतर्मन को और कर दे उसकी आत्मा को लहूलुहान

 

दो

औरतें उम्र गुज़ार  देती हैं,
खुद को साबित करने में।
और मरने तक काटती हैं,
अपनी बेगुनाही की सज़ा।

 

तीन

प्रेम स्त्रियों के लिए,
भोर का वो स्वपन है।
जिसके सच होने की,
प्रतीक्षा उम्र भर करती हैं।

 

चार

अभिलाषाओं के अरण्य में,
प्रेम खोजती स्त्रियां,
एक दिन भटक कर,
स्वयं खो जाती हैं।
और फिर प्रेम छोड़ कर,
निकलती हैं खुद की तलाश में।

 

पांच

संघर्ष करते हुए,
जीवित रहना ठीक वैसे ही है।
जैसे धारा के विपरीत,
मछली का नदी में तैरना।

 

कुछ अशआर 

 

1.
सूखे हुए दरख़तों पर लौट कर फिर कभी सबा न आयी,
देखा कई दफा मुड़कर, गुज़रे लम्हों से फिर कोई सदा न आई

2.
शब ए फुरकत में तन्हाई से कुछ इस कदर हुए वाबस्ता,
पलकों की दहलीज़ पर ख्वाब सुनते रहे अश्कों की दास्ताँ।

3.
जाने कौन गॉंव को शहरों की तहज़ीब दे गया,
छीन कर रौनक उनकी तोहफे में वीरानियाँ दे गया।

4.
आमद में उनकी हम पलकें बिछाये बैठे हैं,
वो हैं की मसरूफियत का वाहना बनाये बैठे हैं।