पुरुष की आँख : रिप्ड जींस बनाम आधुनिकता और स्त्री स्वतंत्रता का कुपढ़ पाठ


उत्तराखंड के सीएम तीरथ सिंह रावत के रिप्ड जींस और उसके विरोध पर जानेमाने चित्रकार, लेखक व पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख ‘अंधत्व अतीत का और आधुनिकता का’ [पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें] पूरे विमर्श को न सिर्फ गलत दिशा में ले जाता है बल्कि छिपे तरीके से उन लोगों पर हमला भी करता है जो स्त्रियों की समानता और स्वतंत्रता की लड़ाई में लंबे समय से संघर्षरत हैं। बहस की शुरुआत उत्तराखंड के नये मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के बयान से हुई थी। उन्होंने दरअसल अपने बयान में एक साथ कई निशाने साधे थे। एक स्त्री के वस्त्रों पर टिप्पणी, एनजीओ और जेएनयू।

यानी कुल मिलाकर उनका मानना है कि संस्कार वस्त्रों से तय होते हैं और क्योंकि उस महिला ने रिप्ड जींस पहन रखी है इसलिए यह संदिग्ध है कि वह समाज के लिए कोई बेहतर काम कर रही होगी। उनके ही शब्दों में, ”जब घुटने देखे और दो बच्चे साथ में दिखे तो मेरे पूछने पर पता चला कि पति जेएनयू में प्रोफेसर हैं और वो खुद कोई एनजीओ चलाती हैं। जो एनजीओ चलाती हैं, उनके घुटने दिखते हैं। समाज के बीच में जाती हो, बच्चे साथ में हैं, क्या संस्कार दोगी?”

अब गौर करने वाली बात यह है कि इस बयान के बाद पिछले दिनों ही सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के जजों को लैंगिक पूर्वाग्रह से बचने की नसीहत दी है और यह कहा है कि वे महिलाओं के आचरण और कपड़ों पर कोई टिप्पणी न करें। जस्टिस एएम खानविलकर और एस रविंद्र भट की बेंच ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए यह बातें कही थीं। हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के एक आरोपी को ज़मानत देते समय शिकायतकर्ता महिला से राखी बंधवाने की शर्त रखी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त को गलत ठहराया था और कहा कि यह उल्टे पीड़िता की तकलीफ बढ़ाता है।

किसी भी बहस के दो पक्ष होते हैं, प्रभु जोशी अपने लेख में तीरथ सिंह रावत के पक्ष को पूरी तरह से गायब कर देते हैं। उस पर कोई चर्चा ही नहीं करते। वे दूसरे पक्ष (यानी जो तीरथ सिंह रावत के बयान पर आपत्ति दर्ज करा रहा है) को कटघरे में खड़ा करते हैं और एक व्यंगात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए अपनी बात रखते हैं और कहते हैं, “जीन्स अब भारतीय युवती का, राष्ट्रीय परिधान है। वह साड़ी, सलवार-कमीज के, भेंनजी-छाप दिखने के लांक्षन से निकलकर काफी दूर आ गई है।” इस व्यंगात्मक उक्ति का सीधा अर्थ यही है कि भारतीय युवती इतनी मूर्ख है वह जीन्स की मदद से खुद को आधुनिक समझती है और सलवार कमीज जैसे परिधान को पिछड़ा हुआ। वे एक काल्पनिक थ्योरी गढ़ते हुए लिखते हैं, “टॉप और जीन्स, जैसे वेस्टर्न गारमेंट का व्यवसाय करने वालों ने समस्या रखी, भारत मे, एक लाख करोड़ से ऊपर का व्यवसाय केवल साड़ी करती है, और सलवार कमीज अलग है। वेस्टर्न गारमेंट के उत्पाद के लिए, इन दोनों को, मार्केट से बाहर करना बहुत ज़रूरी है।”

क्या यह आंशिक रूप से भी सच है? हममें से अधिकांश लोग जो आँखें खुली रखकर अपने आसपास के समाज और रहन-सहन को देखते हैं, यह आसानी से समझ सकते हैं कि जींस अब सिर्फ वेस्टर्न परिधान नहीं है बल्कि पूरे साउथ ईस्ट एशिया में प्रचलित है। बल्कि यूरोपीय देशों में आज भी स्कर्ट और सलवार जैसे ढीले-ढाले लोअर खूब चलन में हैं। दूसरी बात भारत में जींस कामकाजी परिधान है, हालांकि उसमें भी अपवाद हैं- जैसे भारत में स्त्री का परिधान कारपोरेट्स में ऑफिशियल ट्राउजर्स या स्कर्ट, शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में साड़ी अथवा सलवार कमीज तथा हेल्थ, फूड, सिक्योरिटी व परिवहन सेक्टर में आरामदायक ढीली ट्राउजर्स, शर्ट और जैकेट के रूप में दिखती है।

इसे लिखते समय यह सोचकर अच्छा लग रहा है कि हम अब पब्लिक स्पेस में कितनी सारी जगहों पर महिलाओं की उपस्थिति देख पा रहे हैं और हम उनकी मौजूदगी के प्रति इतने सहज हो चुके हैं कि हमें यह सोचने में समय लगता है कि किन जगहों पर उन्होंने क्या पहना होता है। देश में सैकड़ों बड़े ब्रांड और हजारों छोटे ब्रांड हैं जो साड़ियां और सूट बेचते हैं। हर शादी, पार्टी, ऑफिशियल आयोजनों में इंद्रधनुषी रंगो की बहार स्त्रियों के भारतीय परिधानों से ही होती है। पिछले सालों में इसमें न सिर्फ वेराइटी बढ़ी है बल्कि सामान्य मध्यवर्ग और उच्च वर्ग में इन्हें पहनने के बहाने भी बढ़े हैं। पुराने समय में जहां एक ही पोशाक में पूरा दिन निपटा दिया जाता था अब दिन में पांच-छह पोशाकें बदली जाती हैं और ये सारे भारतीय परिधान ही होते हैं।

मगर प्रभु जोशी की सारी चिंता जीन्स को लेकर है। तभी वे आगे लिखते हैं, “एक भारतीय विदुषी ने, रिप्ड जीन्स के विरोध करने वाले को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए, शॉर्ट्स में अपना छायाचित्र सोशल मीडिया पर डाल दिया। हो सकता है, उनके साहस का सीमांत और भी आगे जाये, यदि कोई उनके शॉर्ट्स वाले छाया चित्र की आलोचना कर दे।” गौर करें तो यह टिप्पणी अपमानजक कही जा सकती है। पूरे वक्तव्य में जिस निगाह से स्त्री, उसके वस्त्रों और सांकेतिक तरीके से उससे आगे की संभावनाओं (जरा पढ़िये- साहस का सीमांत और भी आगे जाये) पर उत्कंठा भरी निगाह डाली जा रही है, उससे लिखने वाला सीधे उस व्यक्ति के समकक्ष जाकर खड़ा हो जाता है, जिसे सिर्फ किसी स्त्री की फटी जींस से घुटने दिखते हैं।

इसके बाद वह ‘अमेरिकी विदुषी’ कहते हुए ब्रिटनी स्पीयर्स, पेरिस हिल्डन और लिंडसे लोहान का जिक्र करते हैं। ये सभी पॉप गायिका, अभिनेत्री या मॉडल हैं, जाहिर तौर पर इनका किसी गंभीर विमर्श से कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें अमेरिकी विदुषी कहना एक तंज़ तो हो सकता है मगर यहां पर इनसे जुड़े स्कैंडल्स- जो पेज थ्री और यलो जर्नलिज़्म का हिस्सा हैं- का जिक्र करना बात मूल संदर्भ से हटाना ही है। इसके बाद वे विस्तार से फ्लोरिडा में टॉप उतारकर फेंकने, टी-शर्ट पर लिखे स्लोगन आदि का जिक्र करते हैं और यह स्थापित करते हैं कि पश्चिमी वस्त्रों का अनुसरण एक किस्म की विचारहीनता है। अमेरिकी भारतीयों के बारे में वे लिखते हैं, “भारतीय आते है, वो 80 प्रतिशत अमेरिकी हो जाने की कोशिश करते है। फिर भी अमेरिकी उनको कहते है, bloody third rate xerox copy of our culture.”

इस कथन के बारे में क्या कहें जबकि हमारे सामने अमेरिकी भारतीयों से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य हैं। अमेरिका में भारतीय वोटरों की आबादी लगातार बढ़ रही है। अमेरिका में मौजूद हर छह अप्रवासी में एक भारतीय है। यह इतना बड़ा कारक है, कि राष्ट्रपति चुनाव में रिजल्ट तक में उलटफेर कर सकता है। भारतीय प्रवासी अमेरिका में सबसे अमीर जातीय समुदायों में से एक है। सभी भारतीय वंशजों की औसत वार्षिक आय लगभग $ 89,000 है, जो कि अमेरिकी नागरिकों की औसत वार्षिक आय $ 50,000 से अधिक है। अमेरिका के 12% वैज्ञानिक भारतीय हैं, जिनमें नासा के तो 36% वैज्ञानिक भारतीय हैं। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के 34% कर्मी भारतीय मूल के लोग हैं।

भारतवंशी कमला हैरिस उप राष्ट्रपति हैं, इससे पहले अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेंटेटिव्स में दलीप सिंह सौंद तथा निमी मैककॉनिग्ले का नाम देखा जा सकता है। निकी हेली और बॉबी जिंदल भी अमेरिकी राजनीति में टॉप पर पहुंचे भारतीय हैं। अमेरिका की आठ सबसे बड़ी आईटी कंपनियों को खड़ा करने वाले भारतीय-अमेरिकी ही हैं। फॉर्चून 500 कंपनियों के तहत आने वाली कंपनियों जैसे माइक्रोसॉफ्ट, अडोब, आईबीएम और मास्टरकार्ड के सीइओ भारतीय मूल के अमेरिकी लोग हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर सात में से एक डॉक्टर भारतीय मूल का है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की डॉक्टर एक भारतीय सीमा वर्मा थीं। मगर प्रभु जोशी बताते हैं कि अमेरिकी भारतीय तो “ब्ल्डी थर्ड रेट जिरॉक्स कॉपी” हैं।

जब वे नारीवाद या स्त्री अधिकारों के संदर्भ में व्यंगात्मक ढंग से ‘विदुषी’ शब्द लिखते हैं तो जानबूझकर सिर्फ पॉप सिंगर्स का जिक्र करके रह जाते हैं, और वास्तविक रूप से विदुषी कही जाने वाली 14वीं शताब्दी की क्रिस्टीन दी पिज़ान से लेकर मैरी वॉल्सटॉनक्राफ्ट, जेन ऑस्टेन, ओलंपिया ब्राउन, वर्जीनिया वूल्फ, सिमोन द बोउआर और मौजूदा दौर की आड्रे लॉर्डे, नोबल पुरस्कार विजेता टोनी मोरिसन तथा अरब दुनिया की नवल ई साद्वाई और सारा अहमद का जिक्र नहीं करते। वे इस पूरे डिस्कोर्स को छोड़कर सीधे फैशन पर आ जाते हैं और सारी चिंता इस बात पर टिक गई कि “भारतीय स्त्री में, यौनिक निजता को संभालने वाले दुपट्टे, या साड़ी के पल्ले को हटा कर,वक्ष को पब्लिक स्पीयर्स में” पहुँचा दिया गया। इस पर अपना दुख जाहिर करते हुए वे अपने लेख में कहते हैं, “अब स्त्री के वक्ष, पूरी तरह पुरुष की आंख को, देखने के लिए उपलब्ध थे।”

कोई जोशी जी से पूछे कि ये ‘पुरुष की आँख’ आती कहां से है? क्या इन पुरुषों के घर की स्त्रियां हमेशा दुपट्टा लगाकर अपने वक्षों को ढके रहती हैं या घर में ‘पुरुष की आँख’ पर कोई फिल्टर लग जाता है जो बाहर जाते ही उतर जाता है। क्या किसी के खास अंग को घूरना पुरुष का विशेषाधिकार है जिसके लिए दुपट्टा जैसा सुरक्षा-कवच लगाकर घूमना जरूरी है? यही तर्क शृंखला वहां तक पहुँचती है जब कहा जाता है कि छोटे कपड़े पहनने पर रेप होते हैं।

वे आगे लिखते हैं, “यानी हमने भारतीय स्त्री के भीतर ये भर दिया कि दुपट्टा रखना, पिछड़ी और अधपढी स्त्री के लिए है। टॉप में रहने के लिए जो संकोच था, वो पूरी तरह ही खत्म कर दिया। हमारी मनोवैज्ञानिक रणनीति की ये भारतीय स्त्री पर विजय थी।” यानी विमर्श अब टिक गया ‘भारतीय स्त्री के ‘दुपट्टे’ और ‘संकोच’ पर, जिसे यहां एक मूल्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। मुझे अपने बचपन के दिन याद आते हैं जब उत्तर भारत के ज्यादातर छोटे शहरों में इस तथाकथित ‘संकोच’ ने लड़कियों के चलने के तरीके और शारीरिक बनावट तक को प्रभावित कर दिया। सीधा चलने पर घर की औरतें लड़कियों को टोकती थीं, बाहर लोगों की निगाह से बचने के लिए वे झुककर, कंधे सिकोड़कर और सीने पर किताबे दबाए चला करती थीं। बीते सालों के बदलावों में एक सुखद बदलाव यह है कि इन लड़कियों के ही माता-पिता और हमारे समाज ने उन्हें ‘पुरुष की आँख’ से मुक्त किया है और खुली हवा में सांस लेने की आज़ादी दी है। मगर जोशी जी उस ‘संकोच’ के खत्म होने से दुखी हैं और उस ‘संकोच’ की वापसी चाहते हैं।

उनके लिए दुपट्टाविहीन स्त्री की एक ही छवि यानी सेक्सुअल छवि है, उन्होंने “कांटा लगा” गाने और कुछ विज्ञापनों के जरिए इस बात को स्थापित करने का प्रयास किया है। मगर मैं आपका ध्यान कुछ और छवियों की तरफ आकर्षित करना चाहूँगा। खेल के मैदान में पसीना बहाती युवतियों को याद करिए, एयरफोर्स और भारतीय पुलिस सेवाओं में तनकर खड़ी स्त्रियों का ध्यान करें, हमारी एथलीट, स्वीमर और जिमनास्ट को याद करें, ये सभी ‘दुपट्टाविहीन’ और ‘संकोचविहीन’ छवियां हैं। मगर सुंदर छवियां हैं। इन तस्वीरों में आप अपने घर की स्त्री, अपनी बेटी को देखना चाहेंगे। पर प्रभु जोशी कहते हैं, “जब लोग तर्क देते है कि अश्लीलता तो आंख में होती है, कपड़े में नही। कपड़े नहीं तू नज़र बदल। तो लगता ऐसे लोग निपट भोले, अज्ञानी और बहुत पवित्र लोग है।”

कुल मिलाकर स्त्री का शरीर एक सेक्स ऑब्जेक्ट भर है उससे अलग उस शरीर का कोई मोल नहीं है। यानी आज भी चूल्हें की तेज आँच और गर्मी के बीच घूंघट से आजादी पाने की जो लंबी लड़ाई औरतें लड़ रही हैं वो बेकार हो गया। मेरी मां बताया करती थीं कि पहले गर्मियों की शादियों में दुल्हन को भारी जरी वाली साड़ी पहनकर हमेशा बैठे रहना होता था क्योंकि कई महीने तक आने-जाने वालों का तांता लगा रहता था और उन्हें घमौरियां और त्वचा की दूसरी तकलीफें हो जाती थीं। दरअसल इसी तर्क से एक समय तक हमारे समाज में जोर से हँसने वाली, तेजी से चलने वाली, ऊंची आवाज में बोलने वाली स्त्री को गलत ठहराया जाता था।

लेख के अंत तक पहुँचते पहुँचते आपको एक नया ज्ञान प्राप्त होता है कि ‘मेरा शरीर सिर्फ मेरा है’ दरअसल पोर्न इंडस्ट्री का दिया हुआ स्लोगन है। इसका अपनी मर्जी से गर्भधारण के अधिकार, सेक्स के लिए ना कहने के अधिकार, एक स्त्री का उसके श्रम पर अधिकार, अपने शरीर पर अपनी मर्जी के कपड़े पहनने के अधिकार से जैसे कोई लेना देना नहीं है। तो जोशी जी को यह समझना होगा कि ‘मेरा शरीर सिर्फ मेरा है’ इसलिए नहीं कहा जाता कि पोर्न फिल्मों में काम मिले बल्कि यह भारत के संविधान में अनुच्छेद-21 के अंतर्गत दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार की बात है। अनुच्छेद 21 में नागरिक शब्द का प्रयोग न करके व्यक्ति शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि अनुच्छेद 21 का संरक्षण नागरिक और विदेशी सभी प्रकार के व्यक्तियों को प्राप्त है। इस अनुच्छेद का संरक्षण प्राप्त करने के लिए शर्त केवल मनुष्य होना है।

लेख में कई और टिप्पणियां हैं जो स्त्री का सामान्यीकरण करती हैं और उसके पूरे अस्तित्व पर आपत्तिजनक कमेंट करती हैं, जैसे, “गोरे रंग को लेकर हमारे समाज मे, इतनी दीवानगी है कि अगर गोरे पुरुष के शुक्राणु का बैंक खुल जायें तो उसके वितरण की घोषणा होते ही, बैंक परिसर में भारतीय स्त्री की इतनी अनियंत्रित भीड़ लगेगी कि लाठी चार्ज से ही स्थिति नियंत्रण सम्भव हो पाए।”

पूरे लेख में बड़ी चालाकी से रावत को क्लीन चिट दे दी गई है और उनके बयान के विरोध को रिप्ड जींस के समर्थन से जोड़ दिया गया है। सारे तर्क किसी पब्लिक स्पेस पर मौजूद आंकड़ों या लेख से नहीं उपजे हैं बल्कि ‘एक विज्ञापन फिल्म का निर्माण करने वाले व्यक्ति’, ’15 साल अमेरिका में पढ़े मेरे बेटे’ से मिले ज्ञान को आधार बनाया गया है। रिप्ड जींस को मुख्य मुद्दा बनाते हुए पूरी बहस को नारीवाद बना फैशन और फैशन का मतलब पॉप कल्चर या अपसंस्कृति मानते हुए गलत ठहरा दिया है।

आधुनिकता जिसने पूरी दुनिया को मध्यकालीन जड़ता से बाहर निकालने में मदद की उसे ‘अंधत्व’ बताया गया है और यह स्थापित किया गया है कि दरअसल स्त्री के परिधान का सीधा रिश्ता उसके अपने चयन, पसंद या आराम से नहीं बल्कि पुरुष की यौनिकता से है। शरीर पर अधिकार की बातें बकवास और पोर्न इंडस्ट्री के तर्क हैं और फेमिनिज्म बाजारवाद और भूमंडलीकरण की देन है। अज्ञानता कम खतरनाक है मगर हमारे समाज के बुद्धिजीवियों का इतिहास और संस्कृति का कुपढ़ पाठ, मुद्दों और तथ्यों को तोड़ना मरोड़ना ज्यादा खतरनाक है, यह बड़े बदलावों को लाने वाले विमर्श को गलत दिशा में मोड़ता या फिर डाइल्यूट करता है।

संदर्भः
  1. अंधत्व अतीत का और आधुनिकता का, लेखक प्रभु जोशी sablog.in
    लिंक -https://sablog.in/blindness-past-and-modern/11641/
  2. भारत-अमेरिका संबंधों में भारतीय प्रवासियों का योगदान, मधुलिका बनिवाल | 26 October 2018, Indian Council of World Affairs, Sapru House, New Delhi
    लिंक -https://www.icwa.in/show_content.php?lang=2&level=3&ls_id=2939&lid=2175
  3. सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘महिला क्या पहने या कैसे रहे, जज इस पर टिप्पणी करने से बचें’ latestlaw.com
    लिंक – https://www.latestlaws.com/latest-news/sc-says-avoid-commenting-on-what-the-woman-is-wearing-or-how/