स्त्री तो सदियों से लॉक डाउन में ही रही है- सीमोन की पूण्यतिथि पर विशेष

Simon De Bouar
सीमोन द बोउआर

उपेंद्र कश्यप

लॉक डाउन है। घरों में करीब 250 करोड़ आबादी बन्द है। स्त्री सन्दर्भ में देखें तो आधी आबादी उसकी है, तो इस लिहाज से करीब 125 करोड़ पुरुष वह पीड़ा पहली बार झेल रहे हैं, जिसे इतनी ही स्त्री आबादी सभ्यता के विकास के साथ से झेल रही है। विकसित या अविकसित या विकासशील देश हों, सब जगह स्त्री की त्रासदी, दुर्दशा प्रायः एक सी रही है। पितृ सत्तात्मक समाज ने उसे सदियों से लॉक डाउन कर रखा है।

प्रश्न कर सकते हैं कि भला स्त्री कब लॉक डाउन में नहीं रही हैं? सदियों से स्त्री लॉक डाउन में ही रही है। घर की देहरी के अंदर। हर देश, काल, समाज में स्त्री देहरी के अंदर ही कैद रखी गई। उसे इस लॉक डाउन से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। फर्क पड़ा है उसे लॉक डाउन में रखने वाले पुरुष वर्ग को। वह बेचैन है, क्योंकि उसे बाजार, रंगीनियत, चकाचौंध, भाग दौड़, गप्प लड़ाना पसंद है। आनंद मिलता है उसे। पुरुष समाज को सिर्फ रात्रि-विश्राम भर ही लॉक डाउन पसन्द है। घर में रहना, वह भी स्त्री संपर्क और आनन्द के लिए, आवश्यक समझने के कारण।

द सेकेंड सेक्स

शैक्षिक- आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के कारण अब हुआ यह है कि स्त्री राजनीतिक लाभ के लिए घर की देहरी लांघने लगी है। उसे भी ऐश्वर्य भोगने, सत्ता-सुख पाने के साथ स्वतंत्रता चाहिए, किन्तु अधिकतर मामले ऐसे ही हैं कि कानूनी-राजनीतिक विवशताओं के कारण वर्चस्वशाली पुरुष जमात स्त्री को आगे करता है।

यहां भी औरत स्वतंत्र स्त्री नहीं बस माध्यम या साध्य भर होती है। आज भी अधिकतर समाजों, परिवारों में स्त्री को दोयम दर्जा प्राप्त है। शायद यही वजह रही है कि वर्ष 1949 में जब दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित व विस्तृत पुस्तक सीमोन द बोऊवार ने लिखा तो उसे नाम दिया-द सेकेंड सेक्स।

यहां भी औरत दूसरे लिंग के रूप में है, प्रथम नहीं, जबकि स्त्री ही प्रजनन की शक्ति रखती है, जिसके बिना वंश या सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती है। स्त्री हर जगह घर की दहलीज से निकलने से रोकी गई है, रोकी जाती है, अब भी। बिहार का उदाहरण लें तो स्कूली छात्राओं को जब यहां की नीतीश सरकार ने साइकिल दिया तो किशोरियों के प्रति घृणित पारंपरिक नजरिया बदला।

इसके पीछे वजह यह थी कि लोभवश सबने साइकिल अपनी बेटियों के लिए लिया तो फिर साइकिल चलाती दूसरी किसी किशोरी को कोई कैसे गलियाये। कैसे उस पर फबती कसे, जबकि खुद उसके घर किशोरी साइकिल चलाने लगी। इसने देहरी से बाहर किशोरियों को निकाला। बिहार के संदर्भ में नारी सशक्तीकरण की इससे बड़ी योजना दूसरी नहीं थी। यह क्रांतिकारी बदलाव का आगाज था। और फिर त्रिस्तरीय पंचायत और निकाय चुनाव में आधी आबादी को आधा आरक्षण के सिद्धांत लागू होने से स्त्री घर की देहरी से बाहर निकली।

मातृसत्तात्मक समाज बना पितृसत्तात्मक

यह सब पिछले दशक-डेढ़ दशक की घटना है। इसके पहले तो बस लॉक डाउन ही रहता था हर स्त्री के लिए। एक स्त्री सुबह जगने के साथ कई हिस्सों में बंटनी शुरू होती है।  खटने का उसका सिलसिला शुरू होता है। सास-ससुर, पति, पुत्र, पुत्री समेत घर में सभी बड़े-छोटे रक्तसंबंधियों को खुश रखने के साथ अतिथियों के स्वागत की जिम्मेदारी भी उसी के जिम्मे है। इसके बावजूद उसे दिन भर असंतोष के कटु स्वर सुनने को मिलते हैं। सदियों से औरत लॉक डाउन में क्यों है? आखिर जड़ कहां है?

पहले मातृसत्तात्मक समाज था, जब स्त्री के ही नाम से वंश का नाम होता था, संपत्ति पर उसका अधिकार होता था। जब स्थिति बदली और पितृसत्तात्मक समाज हुआ तो, स्त्री की स्वतंत्रता क्षीण होती चली गयी। पुरुष की मानसिकता बर्चस्व वाली रही है। पितृसत्तात्मक समाज का नेतृत्व उसके हाथ में है, इसलिए उसने अपनी सुविधा के लिए स्त्री को लॉक डाउन में ही रखना श्रेयस्कर समझा / बताया है। भू-राजनैतिक स्थिति जो है, उसमें पश्चिम जगत को बहुत ही उदार मानसिकता, स्वतंत्र विचार वाला खुला समाज माना/ समझा/ बताया जाता है। लेकिन स्त्री उस समाज में भी लॉक डाउन में ही रही है।

स्त्री पैदा नहीं होती, बना दिया जाता है

112 वर्ष पूर्व 09 जनवरी 1908 को पेरिस के एक कैथोलिक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी सीमोन द बोउवार ने अपनी चर्चित पुस्तक “द सेकेंड सेक्स” में लिखा है-‘स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है’। स्त्री के पूर्व और वर्तमान स्थिति का यही अंतिम सत्य है। मतलब साफ है। अपनी सुविधा के अनुकूल गढ़े माहौल में स्त्री को रखा जा सके, इसलिए स्त्री बना दी जाती है। उसे उसी तरह की शिक्षा-संस्कार-व्यवहार बताया-सीखाया जाता है।

यह सदियों से है। पूरब में धार्मिक आख्यान हों या परंपरा, उसमें भी यह साफ दिखता है कि स्त्री घर की देहरी से बाहर न निकले, इसकी पूरी व्यवस्था की गई है। अरस्तू जैसा महान दार्शनिक औरत की परिभाषा इस कदर देता है-‘औरत कुछ गुणवत्ताओं के कारण ही औरत बनती है। हमें स्त्री के स्वभाव से यह समझना चाहिए कि प्राकृतिक रूप में उसमें कुछ कमी है। वह एक प्रासंगिक जीव है। वह आदम की एक अतिरिक्त हड्डी से निर्मित है।’ अरस्तू ने स्त्री को एक निष्क्रिय पदार्थ माना है और पुरुष को शक्ति, गति और जीवन।

धार्मिक ग्रंथों में औरत

वहीं मनु संहिता भी स्त्री को एक निकृष्ट वस्तु माना है। जिसे बंधनों में रखने की बात कही गयी। रोमन कानून औरत को संरक्षण में रखने के लिए कहता है, ताकि उसकी मूढ़ता पर लगाम लगाई जा सके। कुरान शरीफ घोषणा करता है कि -‘पुरुष औरत से उन गुणों के कारण श्रेष्ठ है, जो अल्लाह ने उसे उत्कृष्ट रूप से दिए हैं और अपनी श्रेष्ठता के कारण पुरुष औरत के लिए दहेज जुटा पाता है।’ जिस गैर भारतीय संस्कृति को हम बहुत भाव देते हैं वहां स्त्री का हाल क्या है? औरतों को शैतान का खाला तक कहा गया है।

टर्टयूलियन ने लिखा है- ‘औरत तुम शैतान का दरवाजा हो। जहां शैतान सीधा आक्रमण करने में हिचकता है, वहां वह औरत का सहारा लेकर पुरुष को मिट्टी में मिला देता है। यह तो औरत की गलती है, जिससे प्रभु के पुत्र को मरना पड़ा। तुम औरतों को हमेशा शोक संतप्त रहना होगा।’ एक तो कोसते हैं दूसरे श्राप भी देते हैं, महान लोग। संत एम्ब्रोस तो प्रजनन की प्रक्रिया के लिए स्त्री को पापन बताता है। लिखा है-‘आदम को पाप के रास्ते हव्वा ले जाती है, न कि हव्वा को आदम।’ हद है स्त्री के प्रति पूर्वाग्रह।

औरत की ऐतिहासिक हार

यहां यह महत्वपूर्ण है कि प्रागैतिहासिक यायावर मानव समाज में शारीरिक कमजोरी के बावजूद औरत पुरुष की इतनी अधीनस्थ नहीं थी कि वह एक गुलाम कहलाये। आदिकाल में मातृसत्तात्मक समाज रहा है, यह ध्यान रखें। मातृसत्तात्मक समाज में वंश का नाम मां के नाम से चलता था।

सामूहिक संपत्ति का स्वामित्व भी तब औरत के पास था। जिसकी रक्षा वह अपने सन्तानों के माध्यम से करती थी। ऋग्वेद की ऋचा गीतों में स्त्री की जो वंदना है, उसमें ह्रास ब्राह्मण युग के साथ हुआ। वेदकालीन औरत को जो सत्ता मिली थी, कुरान में उसकी स्थिति हीन बना दी गई। एंगेल्स ने कहा भी है कि- ‘मातृसत्ता से पितृ सत्तात्मक समाज का अवतरण वास्तव में औरत जाति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक हार थी।’

अतीत देखें तो तमाम सभ्यताओं में देवी प्रधान रही है। बाद में इसे भी बदला पुरुष में और देव प्रधान होने लगे। मातृत्व की महानता को अपदस्थ किया गया, समय के साथ। यह कोई क्रांति या घटना नहीं थी। पुरुष अपने वैशिष्ट्य गुण के कारण खुद को श्रेष्ठ समझता रहा और साबित करता रहा।

इस संघर्ष ने मातृ सत्ता व्यवस्था को अपदस्थ कर पितृ सत्ता में बदला। फ्रेजर ने एक जगह लिखा-‘पुरुष देवता बनाता है, औरत उसकी पूजा करती है।’ इसके आगे सीमोन लिखती हैं-‘यह पुरुष ही था, जो निर्णय लेता था कि ईश्वर का चेहरा पुरुष का होगा या नारी का।’स्त्री आज भी नहीं बदली। इसलिए कि पुरुष उसे बदलने नहीं देना चाहता।

स्त्री को स्त्री बनाये रखने में पुरुष वर्ग अपना गौरव समझता है। इसलिए ही व्याभिचार में इज्जत स्त्री की जाती है, पुरुष की नहीं, भले ही दोष पुरुष का हो, अपराध पुरुष ने किया हो। यह मानसिकता जब तक खत्म नहीं होगी तब तक स्त्री लॉक डाउन में ही रहेगी। कोरोना से पहले और कोरोना संकट के बाद भी स्त्री की स्थिति नहीं बदलने वाली।

14 अप्रैल 1986 को सीमोन द बोउवार की पुण्यतिथि है। इस आलेख के लगभग संदर्भ उनकी लिखी पुस्तक “द सेकेंड सेक्स” के प्रभा खेतान द्वारा किये गए हिंदी अनुवाद “स्त्री उपेक्षिता” से लिये गए हैं। बोउवार की इस पुस्तक के मुकाबिल दूसरे किसी लेखक की स्त्री केंद्रित पुस्तक कहीं नहीं टिकती।

उपेंद्र कश्यप, लेखक: श्रमण संस्कृति का वाहक-दाउदनगर, उत्कर्ष (संदर्भ ग्रंथ के दो अंक), संप्रति लेखन: आंचलिक पत्रकारिता के तीन दशक: श्रम, संघर्ष, अपेक्षा और अन्य। 26 वर्ष से लगातार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग एवं लेखन कार्य। लोक संस्कृति “जिउतिया लोकोत्सव” पर शोध, और लेखन। संपर्क: 9931852301