करोड़ों की जमीन, कौड़ियों का अन्न… फिर भी खुशहाल डहरुराम

Indian farmer

स्मिता अखिलेश

जहाँ का किसान पुरखों के जमीन की मिट्टी से अपनी आत्मा को बुहारता, बिछाता और उसे उजला रखता है उसे हम बनियागिरी कैसे सिखाएंगे?

दूर से एक टिमटिमाते बल्ब की रोशनी के नीचे लकड़ी का रेचड़ नुमा गेट जिसमे बांस की चार पांच बल्लियां ही लगी हुई हैं । कोठार को पार करके जाने पर बकरियों का एक झुंड अपने मेमनों को घेरे बैठा हैं । पास ही मुर्गियों के दड़बे में मे बैठी मुर्गियों में सुस्ती ऐसी छाई हुई मानो दूसरे दिन सूरज को निमंत्रण पत्र देने से पहले किसी ध्यान में हों।

यह घर है डहरू राम का! जो 2 गांव दोंडेखुर्द और लालपुर की सीमाओं को जोड़ते या अलग करते हुए। मिट्टी से बना हुआ यह आशियाना डहरु को रेडक्लिफ जैसा महसूस कराता होगा ।अंदर में इमली की विशाल शाखाएं , बेल के पेड़ में बहुत सारे कच्चे फल , आम और अमरूद के बगीचे , सीताफल की महक सहित और भी कई फलदार पेड़ लगे हुए थे, जहां पर डहरूराम की कुटिया किसी ऋषि के आश्रम जैसी दिख रही थी ।

डहरु के घर को देखकर अनुमान लगाना कठिन था कि यहाँ से 200 मीटर की दूरी पर हाईवे का रास्ता जाता है बलौदाबाजार की ओर । गिट्टी के खदानों का मार्ग होने के कारण दिनभर भारी वाहनों का आना जाना लगा रहता है । लेकिन इस काले धुँए को बुजुर्गों से खड़े ये बड़े-बड़े पेड़ अपनी पत्तियों में ही रोक लेते हैं । जैसे कह रहे हो कि जब तक हमारी छांव है कोई भी कालिख , प्रेत की तरह तुम्हारे बच्चों तक नहीं आएगी ।

डहरुराम का 11 एकड़ का प्लाट हाईवे से लगा हुआ है और इसके पीछे दूसरे गांव की सीमा से आगे तक का लगभग 30 एकड़ जमीन फैली हुई है , जिसमें डहरुराम के परिवार द्वारा खेती की जाती है ।
सामाजिक तानेबाने में बंधा यह परिवार अपने घर रोज 40-50 लोगो के लिए भात, दाल और सब्जी की व्यवस्था करता है और डहरु के इस परिवार में उनके खेतिहर मजदूरों के बच्चे भी शामिल हैं जिनकी शादी- ब्याह और पढ़ाई लिखाई भी डहरुराम के जिम्मे है ।

यही प्रेम और जिम्मेवारी के बलबूते डहरुराम की खेती किसानी चल रही है । शहरीकरण के कारण जिस गांव में किसानी के लिए मजदूरों की लगातार कमी होती जा रही है वहीँ डहरुराम के यहाँ कभी मजदूरों की कमी नहीं दिखती। हाइवे से लगी डहरुराम के जमीन की कीमत डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक की है और उनके पास 11 एकड़ का एक पूरा टुकड़ा लगा हुआ है और पीछे की जमीन जो है 30 एकड़ की, वह भी तकरीबन 75 लाख रुपये के मूल्य की है।

विडंबना यह है कि डहरुराम अपने बच्चों के लिए मिट्टी की जगह पक्का घर बनाने के लिए बैंक से ऋण लेने की खातिर बैंक का चक्कर काट रहे हैं लेकिन ऋण नीति का यह हाल है कि यह कहकर बैंक उनसे पल्ला झाड़ लेने की फिराक में है उनके पास अभी तक इनकम टैक्स की कोई फाइल नहीं है ।

डहरुराम की सालाना आय 8 से 10 लाख रुपए तक एक फसल के धान को बेचने से ही हो जाती है , इसके अलावा और भी छोटे-मोटे तरीके के आय इनमें शामिल नहीं है , ऐसे किसान के लिए बैंक संदेह करता है कि जब वह कर नहीं दे रहा हैं तो किश्त का भुगतान भी कैसे करेंगे ?

क्या हम छत्तीसगढ़ के एक किसान की तुलना पंजाब या हरियाणा के किसान से करने की स्थिति में हैं? सिर्फ एक एकड़ जमीन बेच देने से उनकी समस्या जब चुटकियों में हल हो जानी है और इससे उनका मकान बन जाएगा और जीवन स्तर सुधर जाएगा। तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो रहा है?

शायद वह अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवा सकता है, एक विशुद्ध व्यापारी की तरह और भी पूंजी लगाकर नई तकनीक अपनाकर अपने उत्पादन की बढ़िया ब्रांडिंग करके वह अपनी इस संपत्ति को न जाने कितना गुना करने की ताकत रखता है ।

क्या किसी भी प्रकार का कृषि सुधार कानून , ग्रामीण अंचल की मिट्टी की महक इस किसान के सामाजिक ताने-बाने और उसके नैतिक मूल्य के साथ तालमेल बैठा कर उसे नियम कानून सिखाने या विकास करने की स्थिति में हैं?

एक एकड़ जमीन को बेचने से डहरुराम थोड़ा सा दूरस्थ इलाके में 100 एकड़ जमीन लेकर और भी बढ़िया तरीके से खेती किसानी कर सकता हैं  लेकिन उसका कहना है कि जमीन हमारे पुरखों की है जब तक बहुत जरूरत नहीं है हम इसे नहीं बेच सकते। व्यावहारिक तरीके से हम देखें तो डहरुराम को बेवकूफ ही मान लेंगे। या जरूरत से ज्यादा भोला कहेंगे। लेकिन जीवन की खुशी, सुख शांति और विकास के पैमाने को एक ही तराजू में हम जब रख कर देखें तो पाएंगे कि समस्या कहाँ है।

इस बात को समझना जितना कठिन है, उतना ही कठिन इसे अमल में लाना। क्योंकि यह छत्तीसगढ़ के किसान है। और यह छत्तीसगढ़ के किसान की कहानी है यहाँ ऐसे परिवार अभी भी हैं जो एक अनगढ़ तरीके से प्रकृति के साथ बहुत कम संसाधनों में सहजीवन व्यतीत करते है। पर्यावरण और पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ किए बिना विकास का एक अलग मॉडल बनाना संभव क्यों नहीं है। ऐसा क्यों नही हो सकता कि डहरु का सम्मान जमीन को बेचे बिना भी कायम रहे?

यह सवाल छत्तीसगढ़ के इस किसान की कहानी से सहज ही उपजता है। ऐसी नीति या ऐसा मॉडल जो उनके नैतिक मूल्यों को जिंदा रखते हुए विकास की नई परिभाषा गढ़ सके। ऐसी नीति हम क्यों नहीं बना सकते ?

छत्तीसगढ़ के छोटे -बड़ी किसानों की खेती किसानी उनके सपने उनकी मिट्टी की महक से ही जुड़े हुए हैं इसी से आज आज भी यहाँ के गांव सांस लेते है। यदि नैतिक मूल्यों को बचाये रखते हुए डहरुराम का इस तरह किसानी करना विकास नहीं है तो फिर विकास और क्या है?

सोशल एक्टीविस्ट स्मिता अखिलेश का जमीन से जुड़कर काम करने का व्यापक अनुभव है। सहकारी बैंक की बैंक मैनेजर की हैसियत से वे पिछले कई सालों से किसानों, ग्रामीणों और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयासरत है।