मां बनना इतना आसान तो नहीं…

Pregnant-woman

प्रियंका ओम

ईश्वरीय इंजीनियरिंग के तहत पुरुषों का काम है स्त्रियों की देह के भीतर स्पर्म छोड़ना बस।

स्त्रियाँ नौ महीने तक अपने शरीर के अंदर एक और शरीर पोसती है, फीटस को पोषित कर एक जान बनाती है। अपने भीतर उसे पोषित करने के लिये दुगुना खाना, वह जो पसंद हो और वह सब भी जो पसंद नही हो!

छोटे से ओवरी में ढाई से लेकर चार किलो तक तक बच्चे को दिन रात ढोना उतना सरल नही जितना दिखाई देता है। सर में दर्द हो तो दवा नही खा सकते, प्रेग्नेंसी में एसिडिटी तो होती ही है लेकिन दवा नही खा सकते बच्चे पर असर पड़ता है। फ़लाँ फल नही खाना चाहिये ढ़िमकाना सब्ज़ी बच्चे के लिये ठीक नही होता और क्या ही हो जो वही खाने का चाव हो फिर भी ख़ुशी-ख़ुशी नही खाते। माँ होना सरल नही होता जितना मालूम पड़ता है!

कई शारीरिक बदलाव के साथ साथ व्याधियां भी आती है जैसे पेट दर्द, कमर दर्द और उल्टी आना आम समस्या है जो लगभग सभी स्त्रियों को झेलती है। फिर बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया में दो सौ हड्डियाँ टूटने जितना दर्द तो कई बार तो बच्चे को जन्म देते समय मृत्यु का आलिंगन करना और अगर मेरी तरह एपिडूरल के बाद सी ससेक्शन हुआ हो तो पूरी ज़िंदगी लगातार दो घंटे बैठना भी मुश्किल !

वह तो भला हो एक – दो बच्चे जनने के चलन का अन्यथा बच्चा जनते- जनते औरतों के ख़ुद के शरीर में जान नही बचती थी। बिस्तर छोड़ने से लेकर पति के साथ बिस्तर बाँटने तक का सफ़र इतना सुगम नही होता जितना दिखाई देता है!

प्रेग्नन्सी के अंतिम कुछ महीने तो जानलेवा होते हैं उसपर भी बड़ा सा बम्प लिये बेढ़ब शरीर भी भला लगता है हम स्त्रियों को। झुकना तो जैसे सजा हो, उसपे अगर घर मे भारतीय पैन हो तो नैचरल कॉल सा दुखदायी कुछ नही तिसपे बच्चे का प्रथम क्रंदन और सब बिसर जाता है!

मां होना सरल नही।