कामसूत्र, नटराज सिनेमा और हम लड़कियां


मीरा नायर की कामसूत्र बनारस के नटराज सिनेमा हाॅल में लगी थी। मैं और मेरी कुछ सहेलियाँ फिल्म देखना चाहते थे । यह बात है 1997 की।

कामसूत्र फिल्म बनारस के किसी टॉकीज़ में हम लड़कियों को देखना था, यह तो हमने ठान लिया था। बस अब इस पर विचार-विमर्श चल रहा था कि कैसे चला जाए ।

अपने ग्रुप में सिर्फ़ मैं ही शादीशुदा थी। मेरी नई-नई शादी हुई थी। सिंदूर भी चौचक लगाती थी। आखिरकार हमने एक दिन तय कर करके कामसूत्र देखने का प्लान बना ही डाला। निशा, मैं और बीएचयू की कुछ और लड़कियों ने मेरे साथ जाना तय किया।

जब हम सिनेमाहाल पहुंचे तो बुकिंग विंडो के पास देखा महिलाओं की लाइन में टिकट खरीने वाली कुछ और महिलाएं भी हैं। यह देखकर हिम्मत आई। फिर जब टिकट खरीदा तो पता चला कि बालकनी की सबसे पीछे वाली कतार महिलाओं के लिए आरक्षित है। हाॅल के पीछे की तरफ जो दरवाजा था वहाँ से महिलाओं की एन्ट्री थी।

फिल्म शुरू हुई। कहानी कुछ आगे बढ़ी तो पता चला कि एक पुरानी कहानी को नए फैशन वाली फिल्ममेकिंग के रंग में रंगकर, थोड़ा सेक्स का तड़का लगाकर और कुछ माॅडलनुमा लड़के-लड़कियों को लेकर यह फिल्म बना दी गई जिसका नाम कामसूत्र रख दिया गया , खैर, हो सकता है मुझे फिल्म देखने की तमीज़ ना हो पर शशी कपूर व गिरीश करनाड की फिल्म उत्सव हर लिहाज़ से इस फिल्म से कई गुना बेहतर लगी थी मुझे।

पर इस फिल्म में मसाला काफी था। कुछ देर बाद हमारे आगे की सीट पर बैठे कुछ लड़कों से रहा नहीं गया। बेचारे बार-बार पीछे मुड़कर हम लोगों को घूरने लग गए। कुछ देर तो हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया और उनकी हरकतें नजरअंदाज करते रहे। जब उनकी हरकतें बंद नहीं हुईं तो मैने कह ही दिया, “भाई आगे देख लो सीन निकला जा रहा है…।”

बस फिर क्या था। उसके बाद फिर शायद पूरी फिल्म में किसी ने मुड़ कर नहीं देखा। हमारा भी कान्फीडेंस बढ़ गया था और हम भी मजा चखाने के मूड में थे । फिल्म खत्म हो जाने पर भी पुरूषों के चले जाने के बाद ही हमें बाहर किया गया ।

इस घटना को याद करने की एक वजह यह है कि इससे हमें यह सीख मिलती है कि हम औरतों को अपना दखल हर जगह बढ़ाना पड़ेगा। ताकि हमारी मौजूदगी किसी को चौंकाए नहीं या उसे नागवार न लगे। साथ ऐसे लोगों पर इन्सान बनने का दबाव लगातार बनाए रखना पड़ेगा, जिन्होंने स्त्रियों से सहज बरताव करना सीखा ही नहीं। वरना ये तो चींटे, मक्खी, कुत्ते, भेड़िए पता नहीं क्या क्या बने रह जाएँगे और हमें भी चीनी, हड्डी और पता नहीं क्या क्या समझते रहेंगे।

यह संस्मरण लिखा है मनीषा श्रीवास्तव ने। मनीषा पेशे से योग और फिटनेस ट्रेनर हैं। वे शास्त्रीय संगीत से एमए हैं और अपने लिखने-पढ़ने के शौक के चलते फेसबुक पर खुद को अभिव्यक्त करती रहती हैं।


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