कबीर सिंहः वेलकम टू ग्रेट इंडियन पेट्रिआर्की

Kabir Singh

अणु शक्ति सिंह

“तूने मार दिया न तो कनॉट प्लेस पर नंगा घूमूँगा…”

कबीर सिंह ये कहता है और मेरी आत्मा सिहर जाती है. इसी टोन में कहा गया कुछ पुराना याद आ जाता है. फिर होता है फिनाले फुटबॉल मैच का और दिखता है कबीर सिंह का गुस्सा…

वही गुस्सा जो भारतीय परिवार अपने बच्चे में सेते हैं, सहेजते हैं, वही गुस्सा जिसे भारतीय लड़कों की शान माना जाता है. जिसे उनकी माँ और दादी अपनी लाड़ से पोसती हैं और पिता अपनी नज़रअन्दाज़गी से.

इस एबनॉर्मल गुस्से को तमगा मिलता है ‘माचोइज़्म’ का. घरवालों के लिए लड़का है तो इतना गुस्सा तो आएगा न वाला माचोइज़्म… शादी-ब्याह में बाक़यदा लड़की के सामने तारीफ़ की जाती है, ‘वो जो हमारा लड़का हीरा है पर गुस्सा करता है थोड़ा. अब इतने ऊँचे पोस्ट पर है, इतने बड़े घर का है (ब्ला ब्ला) तो गुस्सा करेगा न.’

(यहाँ लड़की से उम्मीद की जाती है कि वह कहे, ‘कोई न जी, मैं सुधार लूँगी.’)

असामान्य गुस्से वाला लड़का अपने गुस्से के बूते बॉलीवुड हीरो की तर्ज़ पर तमाम विलेन से झगड़े मोल लेगा और एकदम आयरन मैन की तरह बाहर आएगा. वह मर्द है – द रियल माचो मैन.

वह माचोइज़्म जिसे दशकों से बॉलीवुड अपने हीरो के ज़रूरी असेट की तरह संभालता आ रहा है, इस स्टीरियोटाइप के साथ कि जिसे बहुत गुस्सा आता है,दरअस्ल वही मर्द है. अपने गुस्से का ताव दिखा कर उस मर्द को दुनिया की सारी मुश्किल चीज़ों को आसान करना आता है.


कबीर सिंह पेट्रिआर्की के मारे हुए एक परवर्ट की कहानी है.

इस मर्द को दुनिया उसके जूते की नोक पर दिखती है और लड़की में ऑब्जेक्ट… उसे पानी पीती, शॉपिंग करती, बाज़ार घूमती लड़कियों में एक पसंद आती है, और उसने उस पर अपना ठप्पा लगा दिया.

अब वह लड़की नहीं, वह उसका मनचाहा खिलौना है, जिसे वह अपनी मर्ज़ी से ट्रीट करता है. लड़की क्या है? लड़की पितृसत्तात्मक समाज का विशुद्ध मादा उत्पाद है.

बालाजी टेलीफिल्म की नायिकाओं की तरह उसे लगता है कि बस यही उग्र लड़का उसका हीरो है. वही लड़का जिसने उसके हर चुनाव को अतिक्रमित कर लिया है, चाहे वह चुनाव दोस्त चुनने की हो अथवा रहने की.

लड़का इस लड़की को लेकर वैसे ही ऑब्सेस्ड है जैसे कोई छोटा बच्चा अपने फ़ेवरेट खिलौने को लेकर होता है. उस खिलौने को उसे संभाल कर रखना है, धूल वाला दाग भी नहीं लगने देना है. कोई ग़लती से छू ले तो दंगा हो जाये और उसकी तो ख़ैर नहीं, जिसने जान बूझकर ख़राब करने की कोशिश की.

होता क्या है, एक दिन खिलौना छिन जाता है. और लड़का बेतहाशा पागल हो जाता है. खोये हुए खिलौने की चाह इतनी अधिक है कि बाक़ी तमाम खिलौनों का नाम उस खोये खिलौने के नाम पर रखना चाहता है मगर खोये खिलौने से प्यार इतना होता है कि कुछ भी दिल की मुराद पूरी नहीं कर पाता है!

खिलौने को भुलाने का ग़म इतना कि इसे भुलाने के लिए नशा इकलौता रास्ता बचता है. समाज की मर्दानगी और ख़ुद के झूठे माचोइज़्म का मारा लड़का अपनी भावनाओं को दबा देना चाहता है. फूट फूट कर रोना चाहता है मगर रो नहीं पाता, कहीं न कहीं उसकी मर्दानगी हर्ट हो जाती है. जब-जब उसके अंदर के कोमल हिस्से में कोई सुगबुगाहट होती है, वो अपना गुस्सा और ओढ़ लेता है. तेज़ आवाज़ में चिल्लाकर वह दुनिया को चुप करवा देना चाहता है.

एन्ड जस्ट हियर, वेलकम टू ग्रेट इंडियन पेट्रिआर्की…

वह पेट्रिआर्की जो न सिर्फ़ बेहद स्त्री-विरोधी है, पुरुषों के लिए भी उतनी ही कठोर होती है. मूँछों पर ताव देने वाली यह पितृसत्ता अपने सभी बच्चों को एक तरह से बर्बाद करती है. एक के लिए रोना नसीब में लिख देती है, दूसरे से तमाम कोमल भावनाएँ छीन लेती है. एक को ज़बर्दस्ती नाज़ुक बना देती है, दूसरे के नाज़ुक हिस्से को भी कठोर कर देती है.

कबीर सिंह पेट्रिआर्की के मारे हुए एक परवर्ट की कहानी है, वह परवर्ट जो समाज में उतना ही ज़्यादा मौज़ूद है जितनी पेट्रिआर्की की मारी हुई लड़कियाँ. मुआमला इस फ़िल्म पर बैन लगाने से नहीं बनेगा, बात बनेगी ऐसी फ़िल्मों को देखने से, ऐसे केसेज़ को पहचानने से. अपने आस-पास मौज़ूद हर कबीर सिंह को यह समझाने से कि ‘डूड तुम्हारा माचोइज़्म तुम्हें लड़की नहीं दे रहा है, वो जो लड़की है जो तुमसे किसी भी वजह से मुहब्ब्त करती है, उसे तुम दूर कर रहे हो. माचोइज़्म दरअस्ल इंटरवल से पहले वाले कबीर सिंह की हरक़तों में नहीं है, असल मर्द वो होता है जो फ़िल्म के आख़िर में नाराज़ माशूका के थप्पड़ खा रहा होता है और अपनी ग़लतियों पर ख़ूब आँसू बहा रहा होता है.’

और लड़कियों, आप किसी सीरियल या फ़िल्म का स्क्रिप्टेड क़िरदार नहीं हैं जो स्क्रिप्ट राइटर आपसे हीरो को सुधरवा ही लेगा. आप गुड़िया भी नहीं जो किसी के हाथों की कठपुतली बन जाएँ. आप जीती जागती, बराबर अधिकार वाली वे लड़कियाँ हैं जिनका यह जानना ज़रूरी है कि किसी को सुधारते-सुधारते वे कहीं उसका ‘पोजेशन’ तो नहीं बन गयी हैं. जिस दिन इसका ज़रा भी इल्म हो या फिर आत्म-सम्मान को तनिक भी ठेस पहुँचे, मूव ऑउट. देर होने से पहले क़दम उठाना ज़रुरी है और इसका कोई दूसरा उपाय नहीं है.

फिर से, जितनी भी बार आप कबीर सिंह पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं, शुतुरमुर्ग की तरह सर छिपा कर शिकारी से बच लेने की नाक़ामयाब कोशिश करते हैं. हमें तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए फ़िल्ममेकर्स का कि इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने हमारे आस-पास के कितने कबीर सिंह को पहचानने की समझ दी और वक़्त पड़ने पर उन्हें ज़रूरी थप्पड़ लगाने की तमीज़ भी…

युवा लेखिका अणु शक्ति सिंह मौजूदा स्त्री विमर्श के कुछ चर्चित नामों में से एक हैं। वे समसामयिक मुद्दों पर अपनी सार्थक और पक्षधरता के साथ टिप्पणी देने के लिए खास तौर पर जानी जाती हैं।


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