वेब सीरीज़ बॉम्बे बेगम्स : महत्वाकांक्षाओं और समझौतों के बीच झूलती स्त्रियाँ

वेब सिरीज़ बॉम्बे बेगम्स

गति उपाध्याय

भारत में ‘#मीटू’ जैसे विषय पर बनी पहली सीरीज़ है और सभी वेब सीरीज की तरह अंग्रेजीदा दर्शकों के लिए खास है- बॉम्बे बेगम्स… बोरनीला चटर्जी और अलंकृता श्रीवास्तव की लिखी और निर्देशित वेबसीरीज़ बॉम्बे बेगम्स में स्त्री दृष्टि है कहीं न कहीं, शायद इसीलिए पुरुषों को एक्सप्लॉयट करती औरतें दिखती तो है पर चिह्नित नहीं की जाती।

असल में यह पहली पीढ़ी है जहां लड़कियां कॉलेज से सीधे कॉरपोरेटवर्ल्ड में प्लेस हो रही है। एक बड़ा वर्ग है जहां आगे बढ़ने और ख़ुद को स्थापित करने की होड़ में लगभग सारी औरतें जिंदगी से भी बड़े समझौते कर रही हैं। तिस पर अगर शहर मुंबई हो तो बात ही क्या!

मुंबई शहर हमेशा से ही क्रूर रहा है खासकर हिंदी पट्टी के लोगों के लिए यही हिंदी पट्टी की लड़कियां मुंबई पर मुंबई की क्वीन बन जाने के लिए बेचैन हैं। मुंबई शहर में जीने का मूल मंत्र है रफ़्तार -जहां जिंदगी धोखा है या धोखेबाजी जिंदगी कोई तय नहीं कर पाता।

कहानी की सारी महिलाएं महत्वाकांक्षी और समझदार हैं। अभी हमें इतनी मजबूत अल्कोहलिक औरतें देखने की आदत नहीं है। सेक्स को उतना ही कॉमन दिखाया गया है जितना ये हो गया है पर स्क्रीन पर सब दिखाने से थोड़ा सा बचा जा सकता था।

‘बॉम्बे बेगम्स’ पर मेरा रंग की विशेष परिचर्चा देखें 

फिल्म बेसिकली पूजा भट्ट की लगती है। #मीटू और किसी बैंक सीईओ के करप्शन में फंसने जैसी असल घटनाओं के कॉकटेल पर बनी वेब सीरीज़ है बॉम्बे बेगम्स। पूरी सिरीज़ में डायलॉग्स लगभग इंग्लिश में है। सिरीज़ के बैकग्राउंड वायस में एक नैरेशन, एक कविता चलती रहती है कविता लिखने वाली, पेंटिंग करती एक टीन की भी कहानी है जो अपनी माँ की मौत से उबर ही नहीं पाती।

फिल्म ‘पिंक’ से एक कदम आगे की है यह सीरीज़, जो हर महिला के नो को समझाने के लिए बनी है कि मॉडर्न वनपीस ड्रेस्ड अल्कोहलिक लड़की के भी नो के मायने हैं। वहीं दूसरी तरफ एक प्रॉस्टिट्यूट के भी नो कहने की उम्मीद देती है यह सिरीज़, जो अपनी तबाही जानते हुए भी नो कहती है और अपने नो पर आख़िर तक अडिग रहती है।

कपल्स का वर्कप्लेस जब एक होता है तो जहाँ औरतें ज़्यादा अच्छा कर रहीं होती हैं, वहीं यह भी दिखाया है कि पति की अच्छी से अच्छी सलाह पर बॉसेस कैसे लेडी बॉडी को भड़का दिया करते हैं। प्रोफेशनल लेडी काअप्रोच थोड़ा घातक होता है, जिसे रिश्तों में बेवफ़ाई का बड़ा कारण बनता दिखाया गया है और जो बाद में बहुत सारे फ़साद की जड़ भी बन जाता है।

फिल्म वो सभी दर्शक जिनको प्यार के नाम पर धोखा मिला है अपने दिल के टुकड़ों को समेटने के लिए जरूर देखें हिम्मत मिलेगी। वो लड़कियां भी जिन्होंने कभी अपने प्रेम को डूब कर चाहा और पता ही नहीं चला कि कब वो प्रेमी ही उनका दुश्मन बन बैठा और वो सभी पुरुष जिन्हें पता ही नहीं चला कि एक दिन अचानक उन्हें क्यों चीट किया गया।

जैज़ गीतों के अलावा गीत संगीत में कुछ याद रखने जैसा नहीं है। वर्जीनिया वुल्फ की कविता हर स्त्री का एक कमरा होना चाहिए आज भी फिल्मों और वेब सीरीज़ में लिखा-पढ़ा जा रहा है। सेक्स सीन्स को थोड़ा कम किया जा सकता था, थोड़ी और हिंदी भी मिलायी जा सकती थी।

It’s time to all women come together… डायलॉग के साथ सिरीज़ का अंत सुकून देता है। पूजा भट्ट, शाहाना गोस्वामी, अमृता सुभाष, प्लबिता, मनीष चौधरी, विवेक गोम्बर दानिश हुसैन सभी ने दमदार अभिनय किया है पूजा भट्ट और प्लबिता ने छाप छोड़ी है, अक्षय सिंह की सिनेमेटोग्राफ़ी भी ठीक लगी।

यह सीरीज़ नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है और देखी जा सकने वाली केटेगरी में है।