वंदना वाजपेयी का कहानी संग्रह ‘विसर्जन’, बदलते मानवीय मूल्यों की कहानियाँ


अंजू शर्मा

कुछ वर्ष पूर्व वंदना वाजपेयी जी से मेरा प्रथम परिचय गाथान्तर पत्रिका की सह संपादक के तौर पर हुआ था। बल्कि मैं इस पत्रिका और उसके ब्लॉग को वंदना जी के नाम से ही जानती थी और उनके श्रम और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित भी हुई। बाद में जब वे अटूट बंधन पत्रिका के स्वतंत्र संपादन से जुड़ गईं तो उनके साथ-साथ एक अटूट बंधन का रिश्ता महसूस होने लगा। उनके ब्लॉग और पत्रिका में मेरी कहानियाँ छपती रहीं और मेरी कहानियों पर उनकी प्रतिक्रियाओं ने बहुत प्रेरित भी किया क्योंकि यही वह समय था जब मैं कविताओं से इतर कहानी की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में लगी थी। इस बीच उनके लेख, कविताओं के माध्यम से उन्हें जानने का अवसर भी मिला पर मैं कोई दो साल पहले उनके कथाकार रूप से रूबरू हुई तो उनसे कहानियाँ भेजने को कहा। इसी क्रम में सुखद आश्चर्य के रूप में कई कहानियों को पढ़ा और इतनी पसंद आयीं कि उन पर फेसबुक पर लिखा भी।

उनका पहला कहानी संग्रह ‘विसर्जन’ मेरे लिये प्रतीक्षित किताबों में से एक था। इस पुस्तक मेले से लौटकर सबसे पहले जिन किताबों को पढ़ा, विसर्जन भी उनमें से एक थी। वंदना जी से मौखिक तौर पर कहानियों पर बात तो कई बार हुई। संग्रह की सूचना और एक कहानी पर विस्तार से लिखकर पोस्ट भी लगाई पर एकाधिक कारणों से संग्रह पर लिखना चाहकर भी लगातार मुल्तवी होता रहा क्योंकि मैं इस पर विस्तार से लिखना चाहती थी और लाख चाहकर भी समय इज़ाज़त नहीं दे रहा था! बहरहाल मैं अब विस्तार से इस संग्रह पर अपनी बात रखना चाहूँगी।

इस संग्रह की बात करूँ तो एक परिचय-सूत्र वन्दना जी स्वयमेव थमा देती हैं जब आत्मकथ्य में वे कहती हैं, “वैसे मैं अक्सर ऐसे पात्रों को चुनती रही हूँ जो बहुत ही आम तरीके से जीवन के कुछ सार्थक सूत्र दे जाते हैं, परन्तु इस कहानी-संग्रह में मैं ऐसे कहानियाँ लेकर आई हूँ जिनके पात्र थोड़े उलझे हुए हैं। इनमें से कुछ का जीवन सुलझ गया, कुछ उलझन के साथ जीवन जीना सीख गये और कुछ उलझाव-सुलझाव से पार चले गए।”

संग्रह से गुजरते हुए इस वक्तव्य का खुलासा पूरी तरह होता है यानी कि वंदना बाजपेयी की कहानियों के पात्र जिन उलझनों में उलझे हैं वे उनके ही निजी या सामाजिक जीवन से जुड़ी वे उलझनें हैं जो कहीं बाहर से नहीं बल्कि हमारे ही जीवन या रिश्तों के ठीक बीच से जन्म लेती हैं और जीवन पर अपना प्रभाव जरूर डालती हैं। वंदना अपने पात्र ढूंढने के लिए अपने ही आसपास के उन लोगों को चुनती हैं या कहिये कि वे लोग उनकी कहानियों के केंद्र में जगह बनाते हैं जो रोजमर्रा के जीवन में कब किसी किस्से में बदल जाते हैं यह लेखक स्वयं भी नहीं जान पाता! बड़ी बात ये है कि उन समस्याओं में पाठक अपना जीवन ढूंढने को बाध्य हो जाता है।

वंदना वाजपेयी

पहली लम्बी और शीर्षक कहानी ‘विसर्जन’ एक आत्मकथात्मक कहानी है जहाँ बचपन से ही अपने पिता के प्रेम से महरूम लड़की अपनी माँ को खोने के बाद नानी से अपने माँ पिता के टूटे रिश्ते का सच जानती है और यहाँ से उसकी पिता को अपने जीवन में लौटा लाने की यात्रा शुरू होती है। औपन्यासिक गुण लिए हुए इस कहानी की इस यात्रा में नताशा कई पुरुषों से मिलती है और हर बड़ी उम्र के पुरुष में उसका अनायास ही पिता को ढूंढने का प्रयास और धोखा मिलने जैसी कई घटनाओं की पुनरावृति सहज ही पाठकों के मन में नताशा के प्रति न केवल सहानुभूति जगाती है अपितु उसके साथ संवेदना का एक ऐसा रिश्ता जुड़ता है जो उसके हर दुःख और पीड़ा में स्वतः ही शामिल भी कर लेता है।

दूसरी कहानी ‘अशुभ’ भी एक मार्मिक कहानी है, दुलारी नाम की ऐसी युवती की जिसे बचपन से ही अशुभ पुकारा गया! घर-परिवार, पडोस आदि में घटने वाली हर अशुभ घटना के लिए दोषी ठहराकर उसके जीवन को उपेक्षा और लानतों से लादकर भी लोग उसे अपनाने की पहल नहीं करते पर सब और से ठकुराई गई यही ‘अशुभ’ जब रेल दुर्घटना में दिवंगत हो पचास हज़ार का मुआवजा बन जाती है तो पति और भाई दोनों उस पर अधिकार जमाने लगते हैं। इस कहानी के शिल्प में लेखिका ने रोचक प्रयोग ये किया है कि इसे मृतका ‘अशुभ’ उर्फ़ दुलारी के मृत्युपरांत दृष्टिकोण से लिखा गया है जिससे कहानी कहीं अधिक विश्वसनीय और कारुणिक बन पड़ी है।

‘फुलवा’ कहानी एक घरों में काम करने वाली ऐसी मासूम लड़की की कहानी है जो शिक्षा के उजाले महरूम होकर बालविवाह का शिकार होकर अपने सपनों को खो देने को अभिशप्त है पर कहानी का अंत बहुत सकारात्मक और प्रेरक हैं जहाँ फुलवा अपनी नन्ही बेटी को पढ़ा-लिखाकर मास्टरनी बनाने की बात करते हुए अपने सपनों को एक नया जीवन दे देती है।

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कुछ रिश्ते हम जन्म के साथ पाते हैं तो कुछ रिश्ते हमें नये सम्बन्धों के मार्फत मिलते हैं पर इसी दुनिया कुछ रिश्ते मन के भी होते हैं जो अनायास ही जुड़ जाते हैं कुछ ऐसे लोगों से जिनसे न रक्त सम्बन्ध होता है न वैवाहिक। ‘दीदी’ कहानी में ऐसे ही एक रिश्ते में बंधें दो लोग दुनियादारी के शिकार होकर उसे निभाने की पूरी आस्था रखते हुए भी नहीं निभा पाते हैं और कहानी का अंत इतना दुखद है कि मन स्वतः ही पीड़ा से भर उठता है।

‘चूड़ियाँ’ कहानी के माध्यम से लेखिका ने समाज की उस मानसिकता पर प्रहार किया है जहाँ किसी स्त्री के जीवन में वैधव्य जीवन के हर रंग, हर ख़ुशी पर से हक़ को छीन लेता है। विशेषकर अंत में इस दृष्टिकोण की स्थापना बहुत ही सकारात्मक संदेश देती है कि जीवन की खुशियों पर सबका पूरा हक़ है, यहाँ तक कि पति की मृत्यु के बाद रिया के चूडियाँ पहनने का अधिकार भी। विशेषकर ये पंक्ति बहुत प्रभावित करती है कि ‘दचका तो लगेगा इतिहास करवट जो बदल रहा है, ये उसी की दस्तक है।”

हमारे समाज में स्त्री की रचनात्मकता दोहरी लड़ाई से जूझती है! जहाँ एक ओर प्रतिभा को अपना स्थान बनाना होता है वहीँ दूसरी ओर इस अधिकार के लिए भी संघर्ष करना होता है कि ये उसका मूल अधिकार है! यही कारण है कि जाने कितनी स्त्रियों ने या तो समाज और परिवारिक सीमाओं के आगे घुटने टेक दिये या फिर ‘बंग महिला’ की तरह अपनी पहचान को छुपाकर गुमनाम जीवन का चयन किया। ‘पुरस्कार’ कहानी की नायिका स्नेह भी इसी दूसरी श्रेणी को चुनकर पूरा जीवन ‘कात्यायनी’ के नाम से गुजारती है और जब उसे जीवन भर की रचनात्मकता के लिए सर्वोच्च पुरस्कार मिलने की घोषणा होती है तो पहचान खुल जाने के संकट से जूझती स्नेह उसे ठुकरा देने का मन बना लेती हैं! हालाँकि अंत सकारात्मक है पर कहीं कहीं ये दुविधा पाठक के मन में गहरी खलिश जताती है।

‘काकी का करवाचौथ’ इस संग्रह बहुत छोटी पर उतनी ही प्रभावशील कहानी है जो बिना लाउड हुए बड़े ही सलीके से एक नए तरह के विमर्श को सामने रखती है! एक और जहाँ दलित और महिलाएं देवालयों में अपने प्रवेश के अधिकार के लिए लड़ रही हैं, कहानी की काकी अपनी समस्त चेतना और शक्ति को जगाकर करवाचौथ के व्रत को त्यागने के लिए उसी दिन का चयन करती है ताकि दूसरी स्त्री के लिए छोड़कर गये अपने पति को अपने जीवन से ख़ारिज कर सके।

जिस तरह से स्त्री अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री की उपस्थिति को स्वीकार नहीं कर पाती बच्चे भी अपनी माँ का स्थान किसी को देने में उतनी ही दुविधा और नकार से गुजरते हैं। ‘फॉरगिव मी’ कहानी की प्रिया के अपने पिता की दूसरी पत्नी मोनिका को लेकर कुछ ऐसे ही पूर्वाग्रहों से जूझने की संवेदनशील दास्तान है!
ऐसे ही संग्रह की एक अन्य बहुत छोटी सी कहानी ‘अस्तित्व’ एक माँ के जीवन में रचे बसे पहाड़ की सुंदर कहानी है।

पति और पत्नी का रिश्ता जाने कितनी अग्निपरीक्षाओं से गुजरते हुए अपनी यात्रा तय करता है। ‘ये कैसी अग्निपरीक्षा’ की पत्नी रोली ऐसे ही इम्तिहान से गुजरते हुए अपने कैन्सरग्रस्त पति के लिये अपनी शुचिता को दांव पर लगा देती है। कहानी के अंत में देह की शुचिता के आगे मन की शुचिता की बात मन को आहिस्ता से छू लेती है। अंतिम कहानी ‘मुक्ति’ एक अनाथ युवती के कई पड़ावों से गुजरते हुए जीवन की लम्बी कहानी है।

इस संग्रह से गुजरते हुए ये स्पष्ट है कि लेखिका की चेतना प्रगतिशील है और यही उनकी रचनाओं में साफ़ परिलक्षित होता है कि ये कहानियां सामाजिक रुढियों पर न केवल प्रहार करने में सक्षम हैं बल्कि अपनी ओर से एक समाधान प्रस्तुत करने में नहीं हिचकतीं। इन कहानियों का मूल स्वर वह संवेदना है जो मानव को मानव से जोड़ते हुए लगभग हर रिश्ते को शिद्दत से निभा जाने की बात रखती है। यूँ भी इंसान के निजत्व से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसके मानवीय सरोकार और उनका उचित निर्वहन लेकिन सबसे खूबसूरत बात यही है इसमें इन्सान अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान को बनाये रखने में भी पूरी तरह कामयाब है। विशेषकर अधिकतर स्त्री प्रधान कहानियों के पात्र एक सजग और प्रगतिशील चेतना से लेस स्त्री की छवि प्रस्तुत करते हैं जो वर्जनाओं को बदलने को कटिबद्ध है। वे तोड़ने से कहीं अधिक सुधारने में यकीन करती हैं उनकी यही दृढ़ता इस संग्रह का सबसे सशक्त पक्ष है।

इन कहानियों की भाषा बहुत ही सहज और सरल है और ये कहा जा सकता है कि ये कहानियां तेजी से बदलते हुए मानवीय मूल्यों को सशक्त ढंग से अभिव्यक्त कर पा रही हैं। लेखिका के दार्शनिक विचारों का प्रभाव हर कहानी पर है और अपनी सोच को लेकर उनकी स्पष्टता और दृढ़ता भी इस संग्रह की एक विशेषता है जो संवादों में भी नजर आती है। पहले संग्रह के तौर पर कहानियों में विषयों की विविधता, उनकी ताज़गी और उन्हें निभा ले जाने में लेखिका की क्षमता अपना प्रभाव छोड़ पाने में सफल रही है और ये उम्मीद जगती है कि आने वाली कहानियों में और अधिक शिल्पगत प्रयोग सामने आयेंगे। अभी इस पहले संग्रह के लिए वंदना जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

एक सुझाव भी है, कुछ कहानियों का औपन्यासिक विस्तार, विस्तृत फलक और विषय वस्तु यह संकेत देती है कि लेखिका को अब एक उपन्यास जरूर लिखना चाहिये। वैसे भी जैसे गद्य कवि की कसौटी माना जाता है वैसे ही उपन्यास को किसी भी कथाकार का बढ़ा कदम तो मान ही सकते हैं। तो इस बड़े कदम की शिद्दत से प्रतीक्षा रहेगी।

एपीएन पब्लिकेशन से प्रकाशित 124 पृष्ठों के इस संग्रह के पेपरबैक संस्करण की कीमत है मात्र 180/- जिसे पढ़कर कीमत वसूल का अहसास होता है।

अंजू शर्मा

अंजू शर्मा चर्चित कवयित्री, कथाकार और समालोचक हैं। कविता-संग्रह ‘कल्पनाओं से परे का समय’ तथा ‘चालीस साला औरतें’ कहानी संग्रह ‘एक नींद हज़ार सपने’ व ‘सुबह ऐसे आती है’, डिजिटल लघु-उपन्यास ‘मन कस्तूरी रे’, उपन्यास ‘शांतिपुरा – टेल ऑफ लव एंड ड्रीम्स’, प्रेम कहानियों का संग्रह ‘रात के हमसफ़र’ प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं। इ-उपन्यास ‘आइना सच नहीं बोलता’ में सहलेखक!

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