प्रज्ञा पाण्डेय का कहानी संग्रह ‘ऑफ व्हाइट’ : गांव की वास्तविक और मार्मिक कहानियां

Pragya Pande short stories Off White

शालिनी श्रीनेत

प्रज्ञा पाण्डेय के कहानी संग्रह ‘ऑफ व्हाइट’ की अधिकतर कहानियां गांव के परिवेश की हैं। ये कहानियां कभी जमींदार परिवार का खाका खींचती हैं, कभी मिडिल क्लास तो कभी मजदूर वर्ग का। इनको पढ़ते समय हर बार एक अलग गांव, अलग माहौल और अलग परिवेश मिलता है। पढ़ते-पढ़ते लगता है कि कोई फिल्म चल रही है। जमींदार का बड़ा घर, उसकी मनमानी, अय्याशी से लेकर मजदूर के घर की झोपड़ी और दाल-रोटी के लाले दिख जाते हैं। इन कहानियों में कहीं सामंती ऐशो-आराम है तो कहीं गरीबी से बेहाल परिवार। कहीं प्रताड़ित होती लड़कियां तो कहीं महिलाएं मिल जाएंगी, अपने-अपने जीवन की उलझनें सुलझाती। कोई किसी का सहारा लेता है तो कोई अपने हिसाब से समाज के बनाए रीति-रिवाज और ढांचे को तोड़ते आगे बढ़ने की कोशिश करता है। लेखिका ने इतनी सहज और आसान भाषा का प्रयोग किया है कि आप पढ़ना शुरू करते हैं तो कहीं अटकते नहीं। और हां, कहीं-कहीं माहौल ऐसा रचा गया कि आप रुक कर सोचेंगे फिर आगे बढ़ेंगे।

प्रज्ञा की सारी कहानियां पढ़ते समय मेरे मन में अपने आसपास के सारे वास्तविक किरदार घूम रहे थे। पहली कहानी ‘जीने से पहले’ में सुखना बो को पढ़ते हुए मुझे अपने बचपन में गांव की चइया बो याद आ गई- दालान लीपती हुई। इस कहानी में सास जब गुड़ चोरी का इल्जाम लगाती पर सुखना बो कहती है, “जितना खटती हूँ, उतना खाती हूँ… और हां मुझे गुड़ पसंद नहीं है।” सुखना बो तेजवा से गर्भधारण करती है और महीप के साथ चली जाती है। इसको पढ़ते समय गांव की लड़की भी याद आ गई। जो शादी-शुदा थी और अपने भाई के साले के साथ भाग गई थी। करीब-करीब उसकी भी यही कहानी थी। दूसरी कहानी है ‘कछार’। गांव में जो महिलाओं की मंडली होती है, उसमें कौन सी लड़की कहां जा रही है, किसके साथ खेल रही है, कब घर आ रही है- इस आधार पर उसका चरित्र तय होता है और यह चिंता भी जताई जाती है कि वो ससुराल में कैसे खपेगी, ये तो नाक ही कटाएगी। पर इस कहानी की नायिका रूपा ससुराल में अपने व्यवहार से इन सब बातों पर पानी फेर देती है। इसे पढ़ते हुए मुझे अपना बचपन याद आया कि मैं लड़कियों के खेल नहीं खेलती थी, कबड्डी खेलती थी और बीड़ी-सिगरेट पीने वाले लोग पसंद नहीं थे तो मेरे अड़ोस-पड़ोस की महिलाओं को भी यह चिंता थी कि ये किस घर जाएंगी और कैसे खपेंगी। मैंने भी इन सब पर पानी फेर दिया।

“उस ऑफ व्हाइट शॉल को उठाकर सीने से लगा लिया है मैंने। मुझे वह मिल गई जो उस दिन धू-धूकर जल गई थी।” प्रज्ञा पाण्डेय की तीसरी कहानी ‘ऑफ व्हाइट’ – जो इस किताब का शीर्षक भी है – बताती है कि पैसा और ताकत गलत-सही का भेद मिटा देता है। कहानी की नायिका के पिता चाची के प्रेम में हैं। यह देख मां के साथ बेटी भी घुटती है। यह कहानी हमारे समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बड़ी संवेदनशीलता से दर्शाती है। कहानी की नायिका एक जगह कहती है कि भले पति नरोत्तम बाहर ऐश करता है पर पूजा पर की वेदी पर उसके साथ बैठने का मुझे ही सौभाग्य प्राप्त है। उनकी चौथी कहानी ‘तस्दीक’ को पढ़ते समय अगर आप गांव से हैं और जमींदारी प्रथा देखी है तो सब कुछ साफ-साफ समझ में आता है। फिल्म की तरह दृश्य चलते हैं और कई बार यह छोटी सी कहानी आपको सोचने पर मजबूर करती है। पटरे वाली फटी जांघिया पहनने वाले खेतिहर मजदूर भोलानाथ को शराब पिलाकर उसकी तस्वीरें खींच ली जाती हैं। व्हाट्सऐप पर घूम रहे अपने चूतर की तस्वीर को देखकर भोलानाथ शर्म के मारे मर जाता है।

अगली कहानी ‘चिरई क जियरा उदास’ उस समय की तरफ इशारा करती है जब बेटा किसी भी उम्र का हो, पितृसत्ता हावी रहती है। उसको अपनी मां मां कम औरत ज्यादा नजर आती है। प्रिया कहते-कहते पति नायिका को छिनाल कह जाता है, और नायिका घर छोड़कर चली जाती है। रास्ते में मिले एक यात्री के साथ उनके घर चली जाती है जो प्रोफेसर होते हैं। कुछ दिन उनके साथ बिताती है मगर फिर वापस उसी घर में पति और बेटे के पास लौट जाती है। कहानी ‘मेरा घर कहां है?’ में दिखाया गया है कि कैसे लड़कियों के ससुराल आने पर उनके पैर पढ़े जाते हैं कि इनके पांव अच्छे हैं और इनके खराब। अगर किसी बहू के आने पर घर में एक तिनका भी खटका तो बहू के पांव ठीक नहीं हैं और उधर मायके से कहा जाता है कि डोली जा रही है, अर्थी आएगी। इस कहानी नायिका के ससुराल आपने पर जब गाय मर जाती है और फसल खराब हो जाती है तो बहू उसे ताने सुनने को मिलते हैं। उसके हर कटाव पर मिटते हुए उसको रात में भोगने वाले पति का भी साथ नहीं मिलता। लड़की के लिए सच में यह सवाल है कि उसका घर कहां है।

पति की मृत्यु के बाद औरत का शोख रंग पहनना समाज वर्जित कर देता है, मगर ‘सुराख़’ कहानी की नायिका अपने मन की सुनती है और घर में सादी वेशभूषा और बाहर अपनी मनमर्जी के रंगबिरंगे कपड़ों में रहती है और अपने सपनों के साथ जीती है। वह दो रूप जीती है। जिस तरह का हमारा समाज उसके लिए रंगहीन और अपने मन के लिए हर रंग। ‘अनजाने पते’ कहानी पढ़ते समय मुझे बरेली के एक किराए के घर की याद हो आती है। मकान मालिक की बेटी के भाई ने प्रेमी के पत्र पर जिस तरह बहन को पीटा था और पंचायत की थी। यह अस्सी-नब्बे के दशक की प्रेम कहानी है जो बहुत ही प्रगाढ़ प्रेम है। आज तो इधर और व्हाट्सऐप पर प्रेम होता है और उधर ब्रेकअप। किसी प्रेम करना मतलब चाल-चलन ठीक होना होता है। इस कहानी में पढ़ने को मिलेगा मुग्धा का अनोखा प्यार।

कहानी ‘सती का चौरा’ में दामिनी की बेटी आगता बिना किसी भय के सती का चौरा तोड़ देती है। यह सती का चौरा दामिनी की बहन कमलिनी की मौत पर बना था। अपने चरित्र पर लांछन लगाए जाने पर कमलिनी ने अपनी जान दे दी थी। एक पत्रकार सुमेधा आगता से पूछती है, “क्या स्त्री में इतना क्रोध होता है?” आगता मुस्कुराती हुए कहती है, “क्या बर्फ सिर्फ जमती है? पिघलती नहीं?” आगता को लगता है कि ब्याह नहीं करना चाहिए। कहीं वो भी बेटी न जन दे। तब क्या होगा जब वो बेटी जनेगी। सती का चौरा तोड़ने के बाद सुमेधा को लगा कि कमलिनी सती के चौरे से निकलकर बाहर खड़ी है। ‘चांद की एक अंतहीन रात’ कहानी में शादी के कुछ ही दिन बाद मां बेटे को वक्त-बेवक्त अपनी बहू से मिलने नहीं देना चाहती। इस कहानी में मां की इनसिक्योरिटी झलकती है। वह अपने बहू-बेटे के दरवाजे पर चारपाई डालकर पहरेदारी करने लगती है। मां की मौत के समय आस-पड़ोस के लोगों को यह चिंता सताती है कि अब इन दोनों को कौन तारेगा। मां की अंतिम विदाई देने नारायण जा रहा होता है और बहू इकौनावाली को देखता है तो वह कहती है, “अब क्या बचा है नारायण, एक ही जिंदगी तो मिली थी। हमें भी और तुम्हें भी। अब क्या दूसरा जनम भी लोगे?”

संग्रह की अंतिम कहानी है ‘लड़कियां मछलियां नहीं होतीं’। जब लड़कियां बाहर निकलती हैं, नौकरी करती हैं और डरती हैं जिंदगी में आने वाले हर खतरे से तो कुछ मजबूरी के रास्ते भी खोज लेती हैं। तुहीना क्यों अपने पर्स में रखती है कंट्रासेप्टिव्स के पैकेट? जब तुहीना का चाचा उसकी मां से यह शिकायत करता है तो वह तिलमिला उठती है और कहती है, तुम्हें कैसे पता। वो बताता है कि उसकी बीबी ने पर्स में देखा है। तो वह कहती है तुम अपनी बीबी की बात बहुत मानते हो और भागी-भागी अपनी बेटी के पास जाती है और वापसी के समय बेटी के पर्स से जब पैसे निकालने जाती है तो खुद पैकेट देख लेती है और बेटी से सवाल-जवाब करती है। बेटी कहती है, “तुम्हें नहीं मालूम कारपोरेट की दुनिया भी एक जंगल है, जहां इनसान दिखाई देने वाले जानवर रहते हैं।” वह कहती है, “मां यहां रोज बलात्कार हो रहे हैं, लड़कियां मारी जा रही है। मैं किसी दरिंदे के अंश को अपने पेट में क्यों ढोऊं?” जब मां जा रही होती है तो पलटकर तूहीना के चेहरे को देखती है बेटी की जगह उसने खुद को खड़ा पाया।

प्रज्ञा पाण्डेय के इस कहानी संग्रह में गांव की मार्मिक और वास्तविक कहानियां हैं। इनमें जो गांव का परिवेश दिखाया गया है वह बहुत कम कहानियों में देखने को मिलता है। हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी ऐसे पात्रों से मिले होते हैं। इन कहानियों को पढ़ना अपने ही अतीत के पन्ने खोलने जैसा है।


LEAVE A REPLY