मृदुला सिन्हा का उपन्यास ‘ज्यों मेहँदी को रंग’ : दोहरी उपेक्षा का शिकार होती विकलांग स्त्री

मृदुला सिन्हा

साधना वर्मा

साहित्य सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति का एक सुयोग्य एवं समर्थ माध्यम है। साहित्यकार समाज के अभ्यान्तर विकास, विसंगतियों औऱ विद्रूपताओं का लेखा-जोखा साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। साहित्य मानव वृत्तियों के विकास का सहज, सरल एवं सरस चित्रण है। समाज के समक्ष उपस्थित होने वाली समस्याओं के समाधान औऱ सुझाव हेतु साहित्यकार दिशा निर्देश करता है क्योंकि, “साहित्य का अंतिम लक्ष्य सम्पूर्ण मानवता, मानवता ही क्यों? प्राणी मात्र को प्रेम और एकता के सूत्र में बाँध देना है।” स्पष्ट है कि साहित्य औऱ समाज का परस्पर अविच्छिन्न संबंध है। साहित्यकार अपने कृति की रचना युग सापेक्ष तथा विविध प्रभावों को ध्यान में रखकर करता है ताकि उसका सम्वेद्य समाज सापेक्ष बन जाय।

इस दृष्टि से आधुनिक उपन्यासकारों में मृदुला सिन्हा की औपन्यासिक कृतियाँ अपने उद्देश्य की पूर्णता में सफल हैं। मानव मात्र को मानवीयता से सम्पन्न बनाने की इच्छा से इनका रचना संसार आप्लावित है। इनके लेखन के केन्द्र में समाज, मनोविज्ञान, स्त्रियाँ, बच्चे, लोक-संस्कृति और ग्रामीण जीवन का सुंदर चित्र प्राप्त होता है। इन्होंने अपने उपन्यासों में उन अनछुए सामाजिक विषयों तथा पात्रों की सृष्टि की है, जिन्हें सदियों से हमारा समाज प्रताड़ित और मुख्य धारा से वंचित करता रहा है। चाहे ‘ज्यों मेहँदी को रंग’ के विकलांग दद्दा जी और शालिनी हों अथवा ‘घरवास’ के कलिया और विलोचना जैसे पात्र, जो दलित होने के कारण सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से अभाव ग्रस्त जीवन जीने हेतु अभिशप्त होते हैं। इसी प्रकार ‘नई देवयानी’ और ‘परित्यक्त लंकेश्वरी’ उपन्यासों के पौराणिक स्त्री पात्र देवयानी औऱ मंदोदरी जिनकी अवहेलना तत्कालीन समाज औऱ साहित्य दोनों ने की, जिनके व्यक्तित्व तथा चरित्र को मृदुला जी ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ समसामयिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है।

गद्य की अन्य विधाओं की भाँति ‘उपन्यास’ का सम्पूर्ण ढाँचा उपन्यासकार के कथ्य पर ही आधारित होता है। वस्तुतः आधुनिक उपन्यास का स्वरूप तभी निर्धारित हुआ, जब उपन्यासकारों ने जीवन के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाना आरम्भ किया। उन्होंने अपने जीवन दर्शन को उपन्यास में अभिव्यक्ति प्रदान की। आज का उपन्यास रचनाकार के ही जीवन दर्शन का विस्तार है। प्रत्येक उपन्यासकार जीवन को विशेष दृष्टिकोण से देख-समझकर उसके प्रति एक विशेष दृष्टि को अपने उपन्यास में अभिव्यक्त करता है, जिस उपन्यासकार के पास कहने के लिए महत्त्वपूर्ण विचार न हों वह अपनी रचना से पाठक को स्थाई रूप से प्रभावित नहीं कर सकता। इस तथ्य की ओऱ संकेत करते हुए वेंकट शर्मा लिखते हैं- “साहित्य को चाहे जीवन की गम्भीर औऱ व्यापक विवेचना कहा जाए अथवा उसे जीवन का वास्तविक दर्शन या दर्पण किंतु ये ध्रुव सत्य है कि उसमें हमारा आत्मचिंतन अवश्वमेव प्रतिबिम्बित होता है।”

इसी आत्मचिंतन और जीवनानुभव का प्रतिफल है, मृदुला जी का उपन्यास ‘ज्यों मेहँदी को रंग’, जो पूर्णरूपेण विकलांग पात्रों के जीवन संघर्ष, उनकी समस्याओं एवं चुनौतियों को यथार्थ रूप से उजागर करता तथा विकलांगों को सामाजिक समता एवं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर जीवन जीने की राह दिखाता है। सन् 1981 ई. में रचित ये उपन्यास ‘अंतरर्राष्ट्रीय विकलांगता दशक’ (1981-1991) के महत्त्व और उसके उद्देश्य को न केवल वैश्विक स्तर पर अपितु भारत में भी स्थापित करने का मात्र साहित्यिक प्रयास ही नहीं वरन् सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। उपन्यास का विमोचन करने से पूर्व स्वर्गीय जैनेन्द्र कुमार ने लेखिका से पूछा था— “इतने सारे विषय हैं उपन्यास लिखने के लिए तुमने दिव्यांगों की समस्याएं क्यों चुनी? अनायास मेरी आँखों से अश्रु-धारा बह चली थी। उन्होने कहा- समझ गया मैं तभी ये रचना अपने भाव, भाषा औऱ कथानक पर खरी उतरी है।”

ज्यों मेंहदी को रंग
मृदुला सिन्हा का उपन्यास ‘ज्यों मेंहदी को रंग’

संस्था में बिहार प्रांत से कृत्रिम पैर लगवाने आयी शालिनी की जीवन -गाथा इस उपन्यास की मुख्य कथा है। बचपन से चंचल स्वभाव और अपनी सहेलियों से तेज चलने वाली शालिनी विवाह के पश्चात पति से भी आगे निकल जाने की उसकी प्रवृत्ति अक्षूण्ण रही। संस्था में आने से पूर्व उसका जीवन खुशहाल था। पति राजेश, सासु माँ तथा परिवार के सभी सदस्य उसे प्रेम करते थे। पति के साथ पहलेजा घाट से स्टीमर की यात्रा पूरी कर, उतरते समय स्टीमर औऱ डेक के बीच फँसकर, उसके दोनों पैर कट कर गंगा की तेज धारा में समाहित हो गए। यहीं से शालिनी के जीवन में विकलांगता के दंश का आरम्भ हुआ, जिसने उसके जीवन की दिशा और उद्देश्य बदल दिया। यहाँ आकर उसने जाना— “एक के लिए जीने से बेहतर है अनेक के लिए जीना।”

शर्मा जी के माध्यम से उसे उपचारार्थ संस्था में लाया जाता है। शर्मा जी शालिनी के पिता तथा दद्दा जी के मित्र थे। आरम्भ में पति समेत परिवार के अन्य सदस्य उसकी सेवा और देख-भाल में सन्नद्ध रहे। लेकिन अनिश्चितता की स्थिति और लंबे उपचार की मानसिकता के कारण वे उससे कटते चले गए औऱ मात्र चौबीस वर्ष की शालिनी जीवन में बिल्कुल अकेली रह गई । जीवन उसके लिए निरर्थक और बोझ बन गया। कृत्रिम पैरों के सहारे जीवन यापन को वह निम्न दर्जे का दायित्व निर्वाह मानने लगी थी । इधर उसके पति राजेश को माँ औऱ सगे-संबंधी दूसरा विवाह करने के लिए विवश करते हैं । पत्नी प्रेम में पगे राजेश ने पहले इनकार कर दिया— “मैं नहीं चाहता बैसाखी पे बैसाखी लगाना।” परंतु सबकी एक ही जिद और रट के कारण वह द्वन्द्वों में घिरने लगा। शालू ने जब सास को भी सांत्वना देनी चाही तो वह बिलख उठी थीं— “बहू मेरे बेटे का क्या होगा? पूरी ज़िंदगी पड़ी है इसकी। सच ही तो कहा था सास ने बेटे के लिए माँ न सोचे तो कौन सोचे।”

परिवार और पड़ोस सभी को राजेश के भावी जीवन की चिंता थी। शालिनी के लिए सबकी संवेदनाएं शून्य हो गई थीं। अस्पताल में खटिया पर पड़े उसने एक स्त्री स्वर सुना, जो न केवल उसे अपितु किसी भी संवेदनशील मनुष्य के मर्म को उद्वेलित कर देगा— “राजेश की माँ बेटे को समझाओ अभी वो नासमझ है। दुनियादारी समझता नहीं। पूरी ज़िंदगी पड़ी है उसकी। गाँव की किसी लड़की से शादी कर दो, जो उसे भी संभालेगी और खटिया पर पड़ी अपाहिज सौत को भी।”

परिवार तथा समाज द्वारा उपेक्षित शालिनी को संस्था में आकर नया जीवन प्राप्त होता है। वह अपने अतीत को भूलाकर संस्था की जिम्मेदारियों को निभाती है। वह संस्था की विकलांग स्त्रियों को सिलाई-कढ़ाई और गुड़िया सिखाने और बनाने की जिम्मेदारी स्वयं लेती है। परंतु इन कामों से भी वह अपने जीवन में आई रिक्तता को पूर्ण करने का असफल प्रयास करती दिखाई देती है। अपने जीवन से दुखी वह किसी औऱ को दुखी नहीं देखना चाहती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण उसके द्वारा निर्मित की गई अनेक गुड्डे-गुड़ियों की जोड़ियाँ हैं— “हँसती-खेलती, फूल तोड़ती, नाचती-गाती हाथ-मे-हाथ मिलाए चलती, नवदम्पत्ति की जोड़ी ही बना पाती थी शालिनी। कृष्ण के साथ राधा की अठखेलियाँ ही उतार पाती। भूल से उसने कभी विरहणी राधा नहीं बनाई। राम लक्ष्मण के साथ अनेक सीताएं बना गई, पुष्प वाटिका से लेकर वन-गमन तक की पर रावण के घर में बैठी सीता बनाना उसके वश की बात न थी। स्त्री का वह रूप उसे भाता ही नहीं था।”

यद्यपि हिन्दी साहित्य में विकलांगता को आधार बना कर साहित्यकारों की छुट-पुट रचनाएं ही मिलती हैं किंतु जितनी सूक्ष्मता एवं गहराई से उपन्यासकार ने विकलांगों के विविध जीवन संघर्षों, उनकी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं, पारिवारिक उपेक्षाओं, विकलांगता के कारण हो रहे मानवीय संबंधों के विघटन और इस विघटन की मानसिकता से उपजी स्वयं को पुनःस्थापित करने की चेतना की अभिव्यक्ति इस उपन्यास में हुई है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। उपन्यासकार ने विकलांगता के प्रति समाज में व्याप्त उस जड़ मानसिकता की ओर संकेत किया है, जहाँ मात्र विकलांग होने से व्यक्ति की जीवन जीने की इच्छाएं, आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं समाप्त नहीं होतीं । विकलांग व्यक्ति किसी अन्य लोक के प्राणी नहीं होते, बल्कि सामान्य जन की भाँति इसी समाज के अंग होते हैं । लेखिका ने इस मनोविज्ञान को उद्घाटित करते हुए लिखा है- “स्टीमर से उतरते वक्त शालिनी की दोनों टाँगे कट भर जाने से उसकी इच्छाएं, आकांक्षाएं खत्म नहीं हुई थीं। पूरा शरीर तो पड़ा ही था।”

शालिनी एक शिक्षित, दृढ़-निश्चयी, स्वाभिमानी, तटस्थ एवं नेतृत्व क्षमता में कुशल है। दद्दा जी की अनुपस्थिति में वह संस्था की समस्त गतिविधियों एवं समस्याओं का निवारण बड़े धैर्य और कुशलता पूर्वक करती है। महेश द्वारा भोजनालय में किए गए विद्रोह के समय वह बड़े साहस और बुद्धिमता का परिचय देती है। इसी क्रम में जब उसे दर्शन के पाँव लग जाने पर भी भीख मांगने का रहस्य ज्ञात होता है, तो वह पहले प्रमाण एकत्र करती है और फिर उसके इस कृत्य पर साधिकार चाँटा भी जड़ देती है। लज्जित होने के बजाय यथार्थ के प्रति दर्शन का आक्रोश फूट पड़ता है— “भीख न मांगे तो क्या करें? पैर बन जाने से क्या मैं कलक्टर बन जाऊँगा? कुर्सी मिल जाएगी मुझे। कुर्सी तोड़ते बैठा रहूँगा। मुझे रोटी तो चाहिए।” दर्शन के मुख से आर्थिक विवशता की दासताँ सुनकर उसे अपने व्यवहार पर पश्चाताप भी होता है और वह दर्शन से क्षमा याचना का मन बना लेती है।

उपन्यासकार ने शालिनी के रूप में एक ऐसे चरित्र की सृष्टि की है, जिसमें विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करने की क्षमता है। खण्डित होकर पुनः संगठित होने की शक्ति है। अपने जीवन और अस्तित्व को पुनर्स्थापित करने का साहस है। संस्था में रहते हुए उसमें एक आशा की किरण बाकी थी कि शायद उसका पति और परिवार उसे स्वीकार कर लेंगे। किंतु जिस दिन शालिनी को यह ज्ञात होता है कि राजेश ने दूसरा विवाह कर लिया है। उसी क्षण वह स्वयं को तिरस्कृत और परावलम्बी जीवन से मुक्त कर लेती है। शर्मा जी के बार-बार आग्रह पर वह तटस्थ होकर कहती है— “मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मेरी चिन्ता आप न करें। मैं जी लूँगी अपनी ज़िंदगी…” शालिनी के इस कथन में आत्मसम्मान के साथ अपनी विकलांगता को लेकर किसी प्रकार की आशंका नहीं है वह स्वयं को लेकर आश्वस्त है, क्योंकि उसे जीवन जीने की नई दृष्टि मिल गई है, जिसमें उसकी विकलांगता और उसका स्त्रीत्व बाधक नहीं है।

लैंगिक विभेद और उपयोगितावादी सामाजिक संरचना की परम्परा सदियों से हमारे समाज में चली आ रही है। विकलांग स्त्री चाहे कितनी ही प्रतिभा सम्पन्न और बुद्धिमती क्यों न हो कदम-कदम पर उसे अपनी प्रतिभाशालिनी होने का प्रमाण प्रत्येक युग में प्रस्तुत करना पड़ा है। सुमन राजे अपनी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’ में लिखती हैं- “ऋषिकाओं में दो नाम ऐसे हैं अपाला और घोषा, दोनों को ही कुष्ठ रोग था । फलस्वरूप अपाला को पिता के घर रहना पड़ा और घोषा का विवाह नहीं हुआ। …घोषा के सारे शरीर में रोम थे। इसलिए उनके पति उन्हें स्वीकार नहीं करते थे।” उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमताएं इतनी विकसित की कि नाम का औचित्य ही बदल गया। वेद और शास्त्र की अनेक शाखाएं उनके रोम हैं।

कहना न होगा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों के जीवन के जिन पहलुओं पर पुरुषों का वर्चस्व होता है उनमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री की प्रजनन क्षमता है। मानव सभ्यता के उदय के आरम्भिक दिनों में स्त्री को कबीले का संसाधन माना जाता था, जिससे वह जुड़ी होती थी। शनै-शनै अभिजात्य वर्ग के उदय के साथ स्त्री शासन समूहों के वंश की सम्पत्ति बन गई। हम देखते हैं कि सघन कृषि के विकास के साथ मानव श्रम का शोषण तथा महिलाओं का यौन नियंत्रण एक दूसरे से जुड़ गए। इस प्रकार स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण का प्रचलन आरम्भ हुआ, जो निजी सम्पत्ति के उदय और वर्ग आधारित शोषण के विकास के साथ तीव्र होता चला गया। आज भी वंश और परिवार को आगे बढ़ाने के लिए स्त्री को संतान उत्पत्ति का साधन ही माना जाता है। आधुनिक समाज भी इस विचार से अछूता नहीं।

इस दृष्टि से विकलांग स्त्री को दोहरी उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। स्त्री को एकमात्र संतानोत्पत्ति का साधन मानने वाली यह पुरुषवादी मानसिकता विकलांग स्त्री से विवाह करने से इस लिए कतराता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में उसकी यौनिकता नगण्य है, वह विकलांग पहले है और स्त्री बाद में। कहीं न कहीं उनके सोच में यह रूढ़िवादी भय घर किए रहता है कि शारीरिक रूप से अक्षम स्त्री गृहस्थ जीवन का निर्वाह भलिभाँति नहीं कर सकती है तथा उससे उत्पन्न होने वाली संतान भी विकलांग ही होगी, जिसके लिए पुरुष नहीं वरन् स्त्री ही जिम्मेदार है। इस विषय में मेरी चीनरी हेसी अपनी पुस्तक ‘विमेन ऐन्ड डिसेब्लिटी इक्वालिटी ऑप़ ऑपचुनिटी’ में लिखती हैं- “एक शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग महिला इस समाज में दोहरी मार झेल रही है। महिलाएं पुरुषों के लिए एक उपभोग की वस्तु हैं यह जग जाहिर है। लेकिन इसी समाज में विकलांग महिला की स्थिति और भी क्रूरतापूर्ण और दयनीय है।” यही कारण है कि विकलांग होने मात्र से न केवल सामाजिक संबंध बल्कि रक्त संबंधों में भी परिवर्तन होते देरी नहीं होती। विकलांग होने से पूर्व शालिनी का पति उसे अपार प्रेम करता है। परंतु विकलांग होने पर उसका वही प्रेम घृणा और उपेक्षा में बदल जाता है। यथा— “सुनो न!…बोलो कान तो खुले हैं मेरे। राजेश चाहकर भी उसके पास नहीं जा पाया था।”

प्रायः यह देखा गया है कि विकलांग पुरुषों की तुलना में विकलांग स्त्रियों को अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कार्यक्षेत्र से लेकर पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन में जहाँ उसे नितांत सहयोग की आवश्यकता होती है वह स्वयं को पृथक और एकांगी महसूस करती है, जबकि विकलांग पुरुषों के समक्ष यह चुनौती थोड़ी कम होती है । लेखिका ने विकलांग स्त्री पुरुष के जीवन के मध्य इस अंतर को स्पष्ट किया है । उपन्यास में दद्दा जी उर्फ़ डॉ अविनाश की पत्नी उन्हें वापस अपने साथ इंगलैंड चलने का प्रस्ताव रखती है, जिसे वे अस्वीकार कर देते हैं। वहीं शालिनी की स्थिति इसके विपरीत है, न तो उसका पति उसकी खबर ही लेता है और न ही घर वापसी का कोई प्रस्ताव ही उसे मिलता है। वह इस जीवन संग्राम में निरा एकांगी है।

देश में विकलांग स्त्रियों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, न ही उनकी प्रतिभा और क्षमता पर संदेह किया जा सकता है। जहाँ उन्हें परिवार, समाज तथा सरकारी सहयोग का लाभ मिल रहा है, वहाँ वे निरंतर कीर्तिमान गढ़ रही हैं। चाहे ‘ज्यों मेहँदी को रंग’ की शालिनी हो या ‘तुम्हारे हिस्से का चाँद’ की सावित्री। ये दोनों ही स्त्रियाँ पारिवारिक, सामाजिक उपेक्षाओं के बावजूद जीवन को अपनी शर्तों पर जीती हैं और जहाँ कहीं इन्हें तनिक भी सहयोग तथा समान अवसर मिलता है वे समाज एवं जीवन दोनों की दिशा और गति परिवर्तित करने में समर्थ हैं। किंतु इतने भर से उनकी समस्याएं और चुनौतियाँ कम नहीं हो जाती हैं। आज हमारे समक्ष प्रश्न यह है कि कब तक समाज और परिवार विकलांग स्त्रियों के प्रति नकारात्मक तथा उपेक्षापूर्ण दृष्टि अपनाएगा? कब तक उसके व्यक्तित्व को सीमित और कुंठित किया जाता रहेगा? कब तक विकलांग पुरुषों से उसकी तुलना कि जाती रहेगी? इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें तलाशने होंगे, तभी विकलांग स्त्रियों की स्थिति में सुधार के साथ-साथ समतामूलक समाज की संकल्पना का सप्ना साकार हो सकता है।

संदर्भ 

  1. ज्यों मेहँदी को रंग, मृदुला सिन्हा, प्रभात प्रकाशन, नोएडा
  2. हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, भारती ज्ञानपीट, नई दिल्ली
  3. पितृसत्ता से कितनी आज़ाद हैं महिलाएं – https://amfeminisminindia.com/2016/10/17/patriarchy-india-feminism-hindi/
  4. तुम्हारे हिस्से का चाँद, शिव कुमार शिव, शिल्पायन प्रकाशन, नई दिल्ली
  5. एस. शाह रजनीकांत, हिन्दी उपन्यास- सामाजिक चेतना (1961-1970), संस्कृति प्रकाशन, अहमदाबाद, संस्करण 1990

यह शोध आलेख साधना वर्मा ने लिखा है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी हैं। उनसे lsr.sadhana@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।