मित्रो मरजानी के लिए इस सरदारनी को बेपनाह मुहब्बत

Krishna Sobti

संगसार सीमा

मित्रो एक ऐसा किरदार है जो कमोबेश हर घर में है लेकिन बस उसने लोक-लाज के लिए अपनी ज़मीर की हत्या कर दी है। ‘तनु वेड्स मनू’ की कंगना रानौत का अल्हड़ और बिंदास छवि कहीं न कहीं इस मित्रो की याद दिलाती है। इतनी बेलौस होकर अगर एक लङ़की इधर उधर मूँह मारती फिरे तो हमारा यह समाज उसे तुरंत स्वीकार नहीं कर पाता।
स्त्रियों की नजर में सुख क्या है ? यह पूछने की जहमत कभी भी समाज ने नहीं उठाई है। महंगी साङ़ियों और गहनों से लदबद स्त्रियां सदा सुहागन की आशीष पाती हुई सदैव सुखी मानी जाती है । सेक्स हमेशा उसके लिए एक वर्जित विषय रहा है । वह इस बारे में बोलना तो दूर अगर सोच भी ले तो वह पाप की श्रेणी में आती है जबकि पुरुषों की कामुक मानसिकता सदैव पवित्र हैं…

उपन्यास के एक प्रसंग में मित्रो की जेठानी ने उसे आगाह करते हुए जब कहा कि “सरदारी देवर देवता पुरुख है, देवरानी। ऐसे मालिक से तू झूठ-मूठ का ब्यौहार कब तक करेगी ? यह राह कुराह छोड़ दे बहना। एक दिन सबको उस न्यायी के दरबार में हाज़र होना है!
मित्रो ने सदा की तरह आँख नचाई – काहे का डर ? जिस बङ़े दरबार वाले का दरबार लगा होगा, वह इन्साफी क्या मर्द जना न होगा?
तुम्हारी देवरानी को भी हाँक पड़ गई तो जग जहान का अलबेला गुमानी एक नज़र तो मित्रो पर भी डाल लेगा !
अपने भय भूत, डर धमकावे अपने ही पास रहने दो ! वह जन्म मरण का हिसाबी सयाना पादशाह तुम्हारा ही सगा संबंधी नही, मित्रो का भी कुछ लगता है। 

तो ऐसी है हमारी मित्रो जो ईश्वर से भी अपने सहज रिश्ते गांठ लेती है…

पंजाबी परिवेश की एक मध्यमवर्गीय व्यापारी परिवार की इस कहानी में मित्रो एकदम अनफिट है वह भी तब ; जब यह कहानी आज की नहीं पचास – साठ वर्ष पहले की हो ।

पुरुषों को जो देवत्व पालने में ही मिल जाया करते हैं उससे स्त्रियों को इसलिए डरकर दबकर रहना चाहिए कि वह कुलक्षिणी; देवी तो हरगिज नहीं । देवी बनने के लिए अभी न जाने उसे कितने ही सतीत्व परीक्षण के दौर से गुजरना होगा और न जाने कितने कुल देवी देवताओं को पूजना होगा । अब वो ये कहे कि मुझे कृष्ण या शिव से ही प्यार है तो उसके लिए नरक का कुंआ खुद गया मानो ।

एक पुरूष की जिम्मेदारी है कि वह अपनी ब्याहता को भोजन , कपङे और गहने लाकर दे लेकिन एक स्त्री इससे इतर उसकी शारीरिक इच्छा बलवती रहे तो वह क्या करे ?

क्यों वह समाज के सामने संतुष्ट होने का ढोंग रचे ? अगर पुरुष असंतुष्ट रह जाए तो उसे उस स्त्री का झोंटा पकङ़ कर अपनी दहलीज से बाहर कर देने का हक है और वह उसकी मौजूदगी में भी परस्त्रीगमन कर सकता है, लेकिन एक स्त्री अगर असंतुष्ट है तो उसे यह बात कहने में ही सौ बार सोचने की हिदायत क्यों?

बरहलाल मित्रो जो हमारे बीच पचास वर्ष पूर्व.ही गढ़ी जा चुकी है; क्या आज भी हमने उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है?

हाय रब्बा, इस मित्रो मरजानी के लिए इस सरदारनी को बेपनाह मुहब्बत पहूँचे।

लेखिका व कवियित्री संगसार सीमा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं। साहित्यिक रचनाओं की पारखी हैं और नई पुरानी किताबों, उनके किरदारों तथा लेखकों पर नियमित लिखती हैं।