हमारी पारिवारिक यात्राओं का उत्सव है सचिन देव शर्मा की किताब ‘ल्हासा नहीं… लवासा’


शालिनी श्रीनेत

हिंदी में यात्रा संस्मरणों की एक समृद्ध मगर उपेक्षित परंपरा रही है। समृद्ध इसलिए कि आरंभिक दौर से लेखकों ने अपने भ्रमण के बहुत ही रोचक वृतांत लिखे हैं। भारतेंदु और द्विवेदी युग के लेखकों ने देश के ही विभन्न स्थलों और दर्शनीय स्थानों को अपने रोचक गद्य से पाठकों के लिए जीवंत कर दिया है। बाद के दौर में देखें तो रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी चीन और यूरोप यात्राओं को बहुत ही रोचक ढंग से बयान किया है। अज्ञेय, मोहन राकेश और निर्मल वर्मा की यात्रा संस्मरणों से जुड़ी किताबें भी पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रही हैं।

उपेक्षित विधा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि इतने समृद्ध लेखन की परंपरा और हाल में पर्यटन में लोगों की बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद हिंदी यात्रा लेखन पर किताबें आज भी बहुत कम हैं। यदा-कदा हमें साहित्यकारों की विदेश यात्राओं के संस्मरण पढ़ने को मिलते हैं मगर उसमें स्थान और लोगों के बारे में शब्दचित्र मिलने की बजाय आत्मप्रलाप और आत्मवंचना अधिक होती है। विशुद्ध यात्रा साहित्य को लोग कितना पसंद करते हैं इसका सबसे अच्छा उदाहरण कुछ वर्ष पूर्व आई अनुराधा बेनीवाल की किताब ‘आजादी मेरा ब्रांड’ है, जिसे पाठकों ने हाथों-हाथ लिया और हिंदी पट्टी में महिला की सोलो-ट्रैवलिंग का रुझान बढ़ा।

इस लिहाज से सचिन देव शर्मा की किताब ‘ल्हासा नहीं… लवासा’ उल्लेखनीय है, जो हमारी पारिवारिक यात्राओं का उत्सव है। हममें से ऐसे तमाम लोग हैं जो देश-दुनिया को जानने और कुछ रिलैक्स करने के लिए यात्राएं करते हैं, सचिन उसी श्रेणी के यायावर हैं। उनकी इस किताब में कुछ पाँच यात्राओं का ब्योरा है। जिन्हें क्रमशः ‘जमटा में सुकून के पल’, ‘ल्हासा नहीं… लवासा’, ‘ये लाल टिब्बा क्या है?’, ‘कोटद्वार की यात्रा’ तथा ‘जयपुर कब जा रहे हो?’ शीर्षकों में समेटा गया है। लेखक की इन सभी यात्राओं में परिवार या फिर पारिवारिक मित्र शामिल हैं। लिहाजा स्थानों के ब्योरे के साथ-साथ कुछ हल्के-फुल्के क्षण भी आते रहते हैं। इससे इन यात्रा संस्मरणों में एक अलग किस्म की अनौपचारिकता और घरेलू परिवेश की खुश्बू है।

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एक उदाहरण काफी होगा- “सौम्या पहले ही चाय और साथ-ही- साथ स्नैक्स का ऑर्डर कर चुकी थी। सितंबर के आखरी हफ़्ते में जब दिल्ली और चंडीगढ़ में अच्छी ख़ासी गर्मी थी जमटा का ये सुहाना मौसम मन को बहुत रास आ रहा था। सूरज घर जाने की तैयारी में था। उसका प्रकाश मद्धिम हो चला था लेकिन उसका प्रकाश अभी भी उसके वहाँ होने का अहसास करा रहा था। चाय की चुस्कियों के बीच देवदार के लंबे-लंबे पेड़ों से टकराकर आती हवा सारे परिवेश में एक अजीब-सी ख़ुशी बिखेर रही थी। विनय अभी तक भी नहीं आया था। हम चाय पी चुके थे।”

सचिन जब अपने ब्लॉग के माध्यम से अपनी यात्राओं को साझा करते हैं तो उसमें तस्वीरों का भी बहुत योगदान होता है, यूं कहें तो यह तस्वीरों और टेक्स्ट का मिलाजुला रूप होता है। उदाहरण के लिए अपकी एक ब्लाग पोस्ट में वे तस्वीर के नीचे लिखते हैं, “ये है मट्टुपट्टी डैम। मुन्नार से कोई 13 किलोमीटर की दूरी पर इडडूकि ज़िले में 5500 फ़ीट से भी अधिक ऊँचाई पर बना 55.4 मिलियन क्यूबिक मीटर की क्षमता का है यह डैम। यह डैम पल्लीवस्सल हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट का हिस्सा है। हम ओणम के आस पास वहाँ गए थे। बरसात का मौसम खत्म होने को था। डैम पानी से लबालब भरा था, जो रिझा भी रहा था और डरा भी रहा था। हमने वहाँ कुछ ख़ास नहीं किया लेकिन वहाँ का नज़ारा बड़ा अदभुत था। लबालब पानी से भरे डैम के ऊपर नाचते बादल नदी और चाय से लदे पहाड़ो की प्रेम कहानी में प्रेमपत्र से दिख रहे थे। उस जगह के धुंधलेपन में एक नशा था। लगता था कि डैम पानी से नहीं उस नशे से भरा था। जबकि डैम की दूसरी तरफ नज़ारा अलग महसूस होता था। अगर आप किसी डैम की सूखी तरफ देखो तो उस तरफ एक अनजान सा डर होता है जो पानी की तरफ़ वाले डर से अलग होता है जैसे किसी अनजाने से मन डर रहा हो। लेकिन वो जगह थी तो दिलकश। आप भी गए हैं क्या वहाँ?”

अब किताब की सीमा यह है कि इसमें तस्वीरों का उस तरह से इस्तेमाल मुश्किल है जैसा कि ब्लॉग में किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में लेखक को अपने शब्दों के जरिए पाठक की कल्पना को जगाना होता है ताकि वो उन तमाम जगहों को खुद से महसूस कर सके जहां लेखक गया है। लेखक ने काफी हद तक तस्वीरों की कमी को पूरा करने का प्रयास किया है, उम्मीद है कि वे अपनी अगली किताब में शब्द चित्रों पर और ज्यादा फोकस बढ़ाएंगे। हिंदी में सेल्फ हेल्प किताबों का चलन नहीं है। क्योंकि सचिन देव शर्मा कुछ एक एचआर प्रोफेशनल हैं तो वे भविष्य में यदि चाहें तो ऐसी किताबों को बड़ी खूबसूरती से सेल्फ हेल्प किताब के रूप में विकसित कर सकते हैं, जिसमें यात्रा संस्मरणों के साथ-साथ कुछ उपयोगी जानकारी भी दी हो। जैसे कि उस जगह जाने के लिए क्या आवश्यक तैयारी की जानी चाहिए, यात्रा में परिवार के साथ जाने में कुल कितना खर्च आएगा, बच्चों की दिलचस्पी के लिए क्या-क्या आदि।

बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि ‘ल्हासा नहीं… लवासा’ हिंदी के यात्रा संस्मरणों कुछ नया जोड़ती है और भविष्य में उनसे उम्मीदें जगाती है। पुस्तक के एक अंश के साथ इस चर्चा को खत्म करते हैं, “दस पंद्रह मिनट साइकिल चलाने के लिए सौ रुपए देने पड़े। रंग-बिरंगी साइकिलें रह-रहकर अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। साइकिलें भी अलग-अलग तरह की थीं वहाँ। पुरानी साइकिलों से बिलकुल अलग, कोई एक सीट की, कोई दो सीट की तो कोई तीन सीट की। ये दो, तीन सीट की साइकिलें कैसे चलती होंगी इससे पहले कि ये सवाल मैं उस साइकिल वाले से पूछ पाता, तीन सीट की साइकिल पर सवार तीन बच्चे तीर की तरह मेरे सामने से निकल गए। वहाँ पर दस मिनट साइकिल चलाना अपने-आप में एक अनुभव था। सूरज की रौशनी से ऊर्जावान वह दिन और सपाट सड़क पर सरपट साइकिल को दौड़ाना अपने आप में किसी बड़ी उपलब्धि से कम न था। न जाने कब से खुली हवा में बेफ़िक्री के साथ साइकिल चलाना एक सपना था, आज कई सालों बाद साइकिल को हाथ लगाया था। साइकिल हाथ में आते ही पूरे एक्साइटमेंट के साथ जैसे ही पूरी ताक़त के साथ पैडल मारा वैसे ही साइकिल हवा से बातें करने लगी। लवासा की शीतल, स्वच्छ हवा फेफड़ों में एक अलग ऊर्जा का संचार कर रही थी। मैं अपने-आप को दस-बारह साल के उस बच्चे की तरह आनंदित महसूस कर रहा था जो साइकिल सीखने के बाद पहली बार बिना किसी की मदद के फरटि से साइकिल चलाता हुआ निकल जाता है। बिटिया भी साइकिल की सवारी के लालच को नहीं छोड़ पाई सो एक चक्कर उसको बैठाकर भी लगा ही दिया। साइकिल, स्कूल और स्कूल के दोस्त एक ऐसी तिकड़ी है जिस पर न जाने कितनी ही कहानियाँ लिखी जा सकती हैं। अपना स्कूल तो वहाँ नहीं था लेकिन साइकिल और दोस्त पास होने की ख़ुशनसीबी तो साथ थी ही। सो रत्नेश के साथ भी दो-दो पैडल मार उस पल को कैमरे में कैदकर सदा के लिए अपनी यादों में पिरो ही लिया।”