क्षमा कौल का उपन्यास ‘मूर्ति भंजन’, निर्वासन साहित्य की एक और कड़ी

क्षमा कौल का उपन्यास मूर्ति भंजन
क्षमा कौल का उपन्यास 'मूर्ति भंजन'

संगसार सीमा

मूर्तियां जो बनी और ढहाई गईं, तय प्रतिमानों के हमारा इतिहास इन्हीं रक्तरंजित मूर्तियों के भग्नावशेषों पर लिखा गया है। हम जितने भव्य और संस्कारी बनने की प्रक्रिया में लगे रहे उतनी ही द्रुत गति से आतताइयों ने उसे छिन्न भिन्न कर डालने में जरा सा भी वक्त नहीं गंवाया। फिलहाल मूर्ति बनने की प्रक्रिया थमती चली गई क्योंकि जब विध्वंस खुल कर होता है तो निर्माण की प्रक्रिया स्वतः धीमी पड़ जाती है…

क्षमा कौल कश्मीर की जानी मानी लेखिका हैं जिनका निर्वासन साहित्य कश्मीरी पंडितों के शोषण और उत्पीड़न की एक खुली किताब है। क्षमा अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए जानी जाती हैं क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी खोया है उसके बाद उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। उपन्यास की भाषा शैली की बात करुं तो वह फंतासियों से कोसों दूर है। उनकी लेखनी सीधी सपाट और हथौड़े की चोट करती हुई प्रतीत होती है।

प्रस्तुत पुस्तक मूर्ति भंजन भी बेशक निर्वासन साहित्य की ही अगली कड़ी है लेकिन इसे पढ़ते वक्त मुझे प्रभा खेतान की शिद्दत से याद आई। क्षमा जी की सभी कहानियों में एक स्त्री होने के नाते कश्मीर के तात्कालिक राजनैतिक परिदृश्य के अलावे स्त्रियों की दशा पर भी सूक्ष्मता से विवेचन है।

इस कहानी की पात्र ही नायिका प्रधान है जो न केवल सुप्रसिद्ध साहित्यकार है, आर्थिक रुप से निर्भर एक स्वाभिमानी मूर्तिकार भी है। ठीक अन्या से अनन्या की तरह ही एक स्त्री की जागृति और स्वाभिमान तथाकथित प्रेम की बलि चढ़ जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का प्रेम भी वरदान नहीं अभिशाप बन कर डंसता है। नीरा का प्रेम भी कुछ ऐसे ही मोड़ पर आकर उसे लील जाता है।

नीरा ने अपने जीवन में कई मूर्तियां बनाई लेकिन जब वह खुद खंडित हो गई तब उन मूर्तियों का अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे किस हाल में होंगी।

“कौन कहता है मूर्ति में ईश्वर नहीं होता ? क्यों मूर्तियां तोड़ते हैं लोग ? मूर्ति की संभाल मनुष्य से कई गुना अधिक कठिन है, श्रमसाध्य है, एकाग्रतापेक्षी है, ध्यानापेक्षी है। मूर्ति मनुष्य के कर्म लिखती है। यह सोचते हुए पुनः चिन्मयी यों सोचती ” यह नीरा नहीं है, यह नीरा नहीं हो सकती । इतने प्रसन्न मुख , प्रसन्न चित्त। पीड़ा पूंज होने के इतर भी । स्मिति की मूर्ति। दीप्ति की मूर्ति…”

नीरा ने तो मुकुंद को टूट कर चाहा गांधारी की तरह आंखों में काली पट्टी बांधकर उस पर भरोसा किया। नीरा के इस प्रेम और आत्मसमर्पण ने आखिर उसकी जिन्दगी ही छीन ली। एक शादीशुदा मर्द से प्यार करने वाली नीरा ने आजीवन कुंआरी रह कर प्रेम को जीने की कोशिश की। लेकिन वह प्रेम में टूटती ही चली गई। स्नायु तंत्र की गंभीर असाध्य बीमारी से जूझती हूई नीरा उन्हीं मूर्तियों में तब्दील हो गई जिसमें कभी उसने अपने प्राण फूंके थे।

उपन्यास का दो पार्ट है। पहले पार्ट में नीरा का बचपन और शिक्षा दीक्षा है उसी क्रम में कश्मीरी निर्वासन और उनके अंतहीन दुखों का मंजर है जो कश्मीर से होते हुए दिल्ली और जम्मू के शरणार्थी कैंपों में सरकती चली जाती है।
पालिटिकल पार्टियों के झुठे सांत्वना और लफ्फाजियों के बीच इन लाखों कश्मीरी पंडितों की कहानी यूं ही सरे आम चलती रहती है…

वहीं नीरा दोहरी परिस्थितियों के मार से जद्दोजहद करती हुई अपनी जिन्दगी बचाने में लगी है।

नारी प्रधान इस उपन्यास में नीरा की तीन पीढ़ी एक साथ है और क्षमा जी ने उन सभी पीढियों की स्त्रियों के साथ एक तारतम्य स्थापित करते हुए स्त्री विमर्श का एक नया खाका खींचा है..

कश्मीरी निर्वासन की पीड़ा को जब भी पढ़ती हूँ बहुत क्षोभ होता है लेकिन इस पीडा के साथ साथ जैसे जैसे नीरा को पढ़ती हूं मन अवसाद से भर जाता है…

मैं समझ सकती हूँ कि इसे लिखते वक्त क्षमा जी की कैसी मनोदशा रही होगी…

मूर्ति भंजन, लेखक: क्षमा कौल, प्रकाशन -प्रभात पेपर बैक्स, कीमत – 500/-

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संगसार सीमा
सीमा संगसार पुस्तकों की प्रेमी हैं। उनका एक कविता संग्रह 'एक शहर का जिन्दा होना' प्रकाशित हो चुका है। अंतरंग, नया ज्ञानोदय, नया पथ, लहक, लोक-विमर्श, दुनिया इन दिनों, इन्द्रप्रस्थ भारती, मंतव्य , स्त्रीकाल, आधी आबादी एवं हिन्दुस्तान सहित तमाम पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं। लोकोदय नवलेखन सम्मान। वे प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन के कार्य से जुड़ी हैं। यहां पर वे मेरा रंग के पाठकों को विभिन्न पुस्तकों से परिचित कराती हैं।

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