किस्सागोई के विस्मृत संसार में दाखिल करती है गीताश्री की ‘भूत-खेला’

Bhoot Khela by Geetashree

दिनेश श्रीनेत

कहानी कौतुक से जन्म लेती है। दुनिया की सबसे पहली कहानी जरूर किसी अनहोनी के बारे में कही गई होगी। कुछ ऐसा जो इंसान के अनुभव से परे होगा और उत्सुकता होगी उस अनुभव को दूसरों तक पहुँचाने की। उस बयान में कल्पना और अचरज के रंग भरे होंगे। दुनिया के तमाम बड़े लेखकों ने भय और रहस्य से भरी कहानियां लिखी हैं। चाहे वो रूसी लेखक गोगोल हों या एडगर एलन पो की अंधेरी दुनिया की कहानियां हों, या चार्ल्स डिकेंस की ‘अ क्रिसमस कैरल’ या फिर ऑस्कर वाइल्ड की ‘पिक्चर आफ डोरियन ग्रे’। देखें तो काफ़्का की ‘मेटामार्फोसिस’ और ‘कॉसल’ भी एक स्तर पर रहस्य और विचित्रता से भरी कहानियां हैं।

हिन्दी गल्प की तो शुरुआत ही तिलिस्म और जासूसी से हुई थी। चाहे वह देवकीनंदन खत्री का उपन्यास ‘चंद्रकांता’ हो या पंडित किशोरी लाल गोस्वामी, बाबू गोपालराम गहमरी अथवा बाबू हरिकृष्ण जौहर के अपराध और जासूसी से संबंधित कथानक हों। लेकिन एक ऐसा वक्त आया कि हिन्दी साहित्य ने कौतुक से दूरी कर ली। मुझे याद है जब किशोरवय में मैंने दाफ्न द्यू मरियम का उपन्यास ‘रेबेका’ पढ़ने को उठाया तो उसकी पहली लाइन “Last night I dreamt I went to Manderley again.” के बाद से उसमें ऐसा डूबा कि खाना खाते समय भी उपन्यास बगल में होता था। बचपन में हम गाँव में ऐसी कहानियां सुना करते थे कि मुंह खुला का खुला रह जाता था। हर थोड़ी देर बात एक ही सवाल “फिर क्या हुआ?”

गीताश्री के नए कहानी संग्रह ‘भूत-खेला’ में फिर से किस्सागोई के उसी संसार में दाखिल होने की कोशिश की गई है। इस संग्रह की कुल नौ कहानियां हमें वापस किस्सों की उसी दुनिया में ले जाती हैं, जिन्हें हम सब कहीं न कहीं अपने गांव, कसबों और बियाबानों में छोड़ आए हैं। इन्हें एक स्तर पर सीधे-सीधे भुतही कहानियां मान सकते हैं तो दूसरे स्तर पर ये हलूसिनेशन (भ्रम/ मतिभ्रम) की कहानियां हैं। जो किसी न किसी नैतिक या इंसानी मूल्य को छूती हुई आगे बढ़ जाती हैं। भूतही कहानियों को हम महज कल्पना की उड़ान कहकर खारिज नहीं कर सकते। ज्यादातर हॉरर कथाओं में एक गहरा सामाजिक संदेश छिपा होता है। ऐसा अन्याय ऐसा अत्याचार जिसे हमारी सामाजिक व्यवस्था दंडित नहीं कर सकती, उसका प्रतिकार कोई अलौकिक शक्ति लेती है।

हजारों साल से हर देश और संस्कृति की इन भयाक्रांत करने वाली कहानियों में एक नैतिक संदेश छिपा होता है। और वह है, ‘बुरा करने पर बुरा ही होगा।’ भूत-खेला की लगभग सभी कहानियां इसी ‘मॉरल ग्राउंड’ पर अपना खेल रचती हैं। यही वजह है कि हर कहानी को पढ़ने के बाद कुछ देर तक आपके साथ रहती है। मुझे निजी तौर पर इसकी एक कहानी ‘उसका सपनो में आना-जाना है’ बहुत पसंद आई। यह एक स्टैंडअप कॉमेडियन पॉल की कहानी है, जिसके ख़्वाबों में एक डरावना बच्चा आकर उसे परेशान करता है। बाकी कहानियों से अलग इस कहानी में गोवा का परिवेश है।

‘भूत-खेला’ खरीदने के लिए यहाँ क्लिक करें

कुछ कहानियां सचमुच में डरावनी लगती हैं, जैसे सारिका और महुआ नाम की दो लड़कियों की अजीबो-गरीब कहानी कहती है इस संग्रह की कथा ‘आत्माओं के एक शहर में’। इस रचना में शहर और उसके आसपास के परिवेश को इतने प्रमाणिक ढंग से प्रस्तुत किया कि यह खुद एक किरदार बन जाता है। इसी तरह से ‘वहां अब कोई नहीं रहता’ और ‘उस पार न जाने क्या होगा’ अंत तक पहुंचते-पहुंचते आपके शरीर में एक झुरझुरी सी छोड़ जाती है। इन कहानियों की खूबी यह है कि इसमें उसी किस्म का टटकापन है, जैसे हम अपने बचपन में या गांव-कसबों में रहस्यमय किस्से सुना करते थे। इस मायने में यह किताब अहम हो जाती है कि भूतों के बहाने आप हिन्दी कहानी के उस देशकाल से दोबारा रु-ब-रू होते हैं, जिसे अब हम भूलते जा रहे हैं।

पश्चिम की रहस्य कथाएं और पश्चिमी दुनिया के भूत ‘अरबन’ हैं। वे पुरानी इमारतों, खंडहरों, बंद फैक्टरियों व घंटाघर में रहते हैं। वे चौराहों और टैक्सियों में भटकते हैं। हमारे भूतों का मन गावों, जंगलों और बियाबानों में रमता है। ऐसे बियाबानों की ‘भूत-खेला’ खूब सैर कराती है- पुराना कुआं, बागीचों की सूनसान दोपहरी, घनी झाड़ियों के बीच से गुजरती पगडंडी, बारिश में उफनती नदी, रहस्यमय से ग्रामीण, वृद्धा, बच्चे। बिहार की विशाल हरी-भरी धरती, विशाल नदी के तट, बियाबान मैदान और बागीचे उठती सोंधी खुश्बू इन कहानियों में मौजूद है।

एक और खास बात यह है कि इन कहानियों में महज सस्पेंस नहीं है। ज्यादातर कहानियों में भूत बाकायदा मौजूद हैं और खूब उत्पात भी मचाते हैं। इस लिहाज से कई बार लगता है कि कुछ कहानियों में यदि ठहराव होता तो ये क्लासिक बन जातीं। उदाहरण के लिए ‘कुएँ का रहस्य’ एक बहुस्तरीय कहानी है। यह कहानी भय के साथ-साथ स्त्री के मन की गहराइयों में भी झांकती है और अलहदा किस्म का स्त्री विमर्श रचती है। उत्तर भारत की ग्रामीण स्त्रियों के संसार में भूत, टोटकों और अजीब घटनाओं की भरमार होती है। ऐसे में लगा कि शायद गीताश्री इस रहस्य दुनिया की अतल गहराइयों में थोड़ा और झांक सकती थीं।

बहरहाल, ‘भूत-खेला’ के बहाने गीताश्री ने हिन्दी के कथा संसार में कई सालों से बंद एक ऐसी बोतल खोल दी है, जिसमें जाने कितनी रहस्यमय कहानियां छिपी हैं। जाने कितनी अभी सामने आएंगी…

गीताश्री से एक मुलाकात और लेडीज़ सर्कल, हसीनाबाद व भूत-खेला पर चर्चा


LEAVE A REPLY