अविनाश मिश्र का ‘चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान’, जहां दैहिक प्रेम प्रार्थना में बदल जाता है


अविनाश मिश्र के कविता संग्रह चौंसठ सूत्र, सोलह अभिमान को हिन्दी की प्रेम कविताओं की परंपरा में देखा जाना चाहिए। हिन्दी में प्रेम कविता की परंपरा पुरानी है। यह प्रेम आत्मिक और आध्यात्मिक ही नहीं, इसमें गहरी ऐंद्रिकता भी है। चाहे वह रीति काल के हिन्दी कवि हों, चाहे संस्कृति साहित्य। प्रेम हमारे यहां बड़ी सघन दैहिकता के साथ उपस्थित है।

अब अगर आधुनिक हिन्दी कविता की बात करें तो केदारनाथ अग्रवाल का जिक्र किये बिना बात आगे बढ़ ही नहीं सकती। उनकी कविताओं की सघन ऐंद्रिकता सिर्फ सौंदर्य तक सीमित नहीं बल्कि वह जीवन की एक असीम ऊर्जा में बदल जाती है। उनके संग्रह हे मेरी तुम में उन्होंने अपनी पत्नी पर प्रेम कवितायें लिखी हैं। एक उदाहरण ही काफी है-

हे मेरी तुम/ जब तुम अपने केश खोलकर/ तरल ताल में लहराओगी/ और नहाकर/ चंदा सी बाहर आओगी/ दो कुमुदों को ढँके हाथ से/ चकि देखती हुई चतुर्दिक/ तब मैं तुमको/ युग्म भुजाओं से भर लूँगा/ और चाँदनी में चूमूंगा तुम्हें रात भर/ ताल किनारे

आधुनिक हिन्दी की प्रेम कविताओं में पाब्लो नेरुदा का गहरा असर रहा है। नेरूदा की कविताओं में दैहिक प्रेम की अद्भुत छटाएँ हैं। अशोक बाजपेयी ने भी दैहिक प्रेम पर कई बहुत ही खूबसूरत कवितायें लिखी हैं। अशोक बाजपेयी का कहना है कि उनकी कविताओं का प्रमुख सरोकार प्रेम है। उसके लिए उन्होंने अक्सर रति का रूपक चुन लिया है। वे कहते हैं- मैं प्रेम के बरक्स रति का कवि नहीं हूँ। अशोक बाजपेयी की एक छोटी कविता पहला चुंबन का उदाहरण पर्याप्त होगा-

एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ
रक्ताभ, उत्सुक
काँपकर जुड़ गई
मैंने देखा :
मैं फूल खिला सकता हूँ।

अब यदि अविनाश मिश्र के ताजातरीन संग्रह पर लौटें सबसे पहले तो वे अपने शीर्षक के साथ ही लिखते हैं – कामसूत्र से प्रेरित। इस तरह से यह कविताएं किसी तरह की दुविधा या भ्रम की गुंजाइश नहीं छोड़तीं और सीधे यह तय करते हुए आगे बढ़ती हैं इन पंक्तियों में आपको दैहिक प्रेम के रंग देखने को मिलेंगे। रंग और ताप- यानी गरमाहट भी ऐंद्रिक प्रेम का एक रूपक है। लेकिन यहीं आजकर अविनाश कुछ अलग हो जाते हैं। यहां प्रेम का उन्माद और तपिश नहीं है। जब आप इन कविताओं से होकर गुजरते हैं तो बड़े सहज रूप से देह और प्रेम को एक तटस्थ नजरिये से देखते हुए आगे बढ़ने लगते हैं। अपनी पहली ही कविता में वे जैसे पाठकों अपने भाव बोध के बारे में पहले से ही बता देते हैं। मंगलाचरण शीर्षक से लिखी गई कविता की पंक्तियां हैं –

मेरे प्रार्थनाक्षर
तुम्हारे नाम के वर्णविन्यास को चूमते हैं

मेरी आकांक्षा है कि
सतत प्रार्थना में ही रहूँ

इस तरह से दैहिक प्रेम की इन तमाम कविताओं में क्षणिक भावोन्माद नहीं है। वह रागात्मकता से गुजरते हुए एक सतत प्रार्थना में बदलता नजर आता है। खुद कवि के शब्दों में “ये कविताएं लिखी नहीं गई” हैं, “ये आई और हुई हैं”। एक साथ कर्मरत होना और उसी पल अपने से विरत होकर खुद को देखना। यही वह दृष्टि है जो इन कविताओं के जरिये कवि हासिल कर सका है।

मैं नहीं आया तुम्हारे पास
तुम ही आईं

तुम्हारा प्यार तुम्हारी ताकत है
मेरा प्यार मेरी दुर्बलता

अंगरेजी के कवि जॉन डन (John Donne) के बारे में कहा जाता था कि वे अपनी कविता में बिंब और विचार को एक साथ पिरोकर लाते थे। उनकी कविता ’द कैनोनाइजेशन’ (The Canonization) का एक भावानुवाद देखें-

परमेश्वर के लिये मौन अपनी रसना रहने दो
मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो ।

एक अब अविनाश की एक और कविता देखें, जिसका शीर्षक है चुम्बन

वे औपचारिक नहीं थे
प्रामाणिक थे
कभी तर्क की तरह प्रस्तुत
कभी सिद्धांत की तरह
वे सबसे प्रचलित दृष्टिकोण की तरह
स्वीकार्य थे
उनमें प्रतीक्षा का धैर्य था
और अनिश्चितता का तत्व भी

युवा कवि अविनाश की कविताओं की यह दूसरी किताब है। उनकी कविताओं की पहली किताब अज्ञातवास की कविताएँ शीर्षक से 2017 में आई थी। वे इस क्षमाप्रार्थना के साथ कि “कवि को स्वयं अपनी कविताओं के विश्लेषण से बचना चाहिये” कहते हैं- “इन कविताओं में अपने प्रेमास्पद को सम्पूर्णता में न जी पाने के यथार्थ के रहते हुए भी उसे सोचते, देखते और चाहते चले जाने का दर्प है।”

करीब 104 पृष्ठ के इस संग्रह की कोई कविता एक आधे पृष्ठ से बड़ी नहीं है। राजकमल प्रकाशन ने इसे बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से एक खूबसूरत सी पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया है। किताब के पेपरबैक संस्करण का मूल्य 125 रूपये है।

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