मल्लिका-ए-ग़ज़ल पर एक मुकम्मल किताब है ‘अख़्तरीः सोज़ और साज़ का अफ़साना’

Begum Akhtar

दिनेश श्रीनेत

संगीत मर्मज्ञ व कवि यतींद्र मिश्र ने हिन्दुस्तान की ‘मल्लिका-ए-ग़ज़ल’ कही जाने वाली अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी यानी बेगम अख़्तर पर एकाग्र पुस्तक का नाम ‘अख़्तरी’ रखा है। ये नाम देशकाल की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए आज एक व्यापक भाव बन चुका है और यतीन्द्र के संपादन में निकली यह किताब अख़्तरी की शख़्सियत के विस्तार को दर्शाती है। इस लिहाज से यह एक अद्भुत संचयन है कि इसमें नई पुरानी पीढ़ी के 20 रचनाकारों की दृष्टि से बेगम अख़्तर की इस व्यापकता को देखने-परखने का प्रयास किया गया है। जिसमें शिवानी और ममता कालिया से लेकर सुशोभित शक्तावत और प्रवीण झा तक शामिल हैं।

कहीं बेगम अख़्तर के फिल्म संगीत चर्चा पर है, तो कहीं उनके एलपी रिकार्ड्स पर। कहीं सत्यजीत रे की फिल्म जलसाघर में उनकी मौजूदगी को दर्ज किया गया है तो कहीं किस तरह गालिब उनकी गायकी में आते हैं इसकी खोजबीन है। अख़्तर को देखने का सबका अपना नजरिया है। सबसे एक अलग तरीके से उनको सुना, गुनगुनाया और अपनी रूह में जज़्ब किया है। इस तरह हर पहलू से एक शख़्सियत को देखते हुए एक मुकम्मल तस्वीर बनती है। इस खूबसूरत और इनसाइटफुल संचयन को यतीन्द्र मिश्र ‘अख़्तरीः सोज़ और साज़ का अफ़साना’ के नाम से एक संपादित किताब के रूप में पेश करते हैं।

खुद यतींद्र मिश्र के एक लंबे लेख और रीता गांगुली व शांति हीरानंद से उनकी लंबी बातचीत के बिना यह किताब शायद अधूरी रह जाती। हमेशा की तरह यतीन्द्र बहुत ठहरकर बेगम अख़्तर की गायकी पर चर्चा करते हैं। अपने लेख ‘अख़्तरीनामाः ज़िंदगी और संगीत सफर के अँधेरे उजाले’ में वे लिखते हैं, “बेगम अख़्तर को मात्र एक गायिका या अभिनेत्री मानकर देखने से संगीत के इतिहास को पूर्णता नहीं मिलती। उनकी जैसी महिला के जीवन में यह देख पाना, इतिहास, संस्कृति और समाज की निगाह से बड़ा प्रासंगिक है कि एक तवायफ़ की दुनिया से निकलकर आने वाली लड़की, किस तरह से समाज के बने-बनाए बंदोबस्त में अपने रहने के लिए, अपनी तरह से तोड़फोड़ करती है और बाई के लिबास से गुजरकर बेगम बनने का बाना अख़्तियार करती है।” इस तरह यतीन्द्र अख़्तरी को सिर्फ गायकी तक सीमित नहीं रखते हैं बल्कि सामाजिक तानेबाने और मान्यताओं में उनकी मौजूदगी से हो रही तोड़फोड़ को भी दर्ज करते चलते हैं।

वाणी प्रकाशन से यतीन्द्र मिश्र के संपादन में आई किताब

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस किताब भाषा के कितने ही अलग-अलग रंगों से अख़्तरी को देखती है। जहां लोकप्रिय लेखिका शिवानी अपने खास अंदाज में उनके बारे में लिखती हैं, “बालिका अख़्तरी को बचपन से ही संगीत से कुछ ऐसा लगाव था कि जहाँ गाना होता, छुप छुप कर सुनती और नकल करती। घर वालों ने पहले तो इन्हें रोकना चाहा; पर समुद्र की उत्तुंग तरंगो को भला कौन रोक सकता था! यदि कोई चेष्टा भी करता, तो शायद लहरों का वह सशक्त ज्वारभाटा उसे ही ले डूबता।” इसी तरह सुशोभित सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ में अख़्तरी की स्क्रीन पर उपस्थिति को अपने खास अंदाज में देखते हैं, “माथे पर बिन्दी, हाथ में कंगन, चटख रंग की साड़ी, गोद में तानपूरा और सिर पर पल्लू। फिल्म के टाइटिल्स में उनका नाम दुर्गा बाई दिया गया है, किन्तु वे जलसे की बाई की तरह नहीं, घर की किसी प्रौढ़ वधु की तरह लगती हैं। शगुन गाती हुई। ये और बात है कि फिल्म में दुर्भाग्य से उनका गाना एक अपशगुन का आरंभ है।”

ममता कालिया के प्रसंग में कहानियों जैसी खुश्बू है। वे लिखती हैं, “बेगम अख़्तर जब बोल उठातीं, धीमे से अपनी गर्दन को एक ख़म देतीं। उनकी नाक की लौंग का लशकारा और कर्णफूलों के हीरों की कनी की चमक हमारी कुर्सियों तक चली आती। उनकी वह कीमती सफ़ेद या क्रीम रंग की साड़ी, कलाई पर बंधी काले पट्टे वाली चमचमाती घड़ी और उनकी ख़ूबसूरत अदायगी हमें एक अलग दुनिया की सैर करा देती। वे अपनी दानेदार आवाज में जिगर मुरादाबादी का कला पेश करतीं- तबियत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है, मेरे हिस्से की गोया हर खुशी कम होती जाती है।” मृत्युंजय अपने आलेख ‘बेगम के ग़ालिब’ में शायरी और गायकी के रिश्ते बारीकी से देखने का प्रयास किया है। लिखते हैं, बेगम के इंतख़ाब में दूसरी कसौटी है शेर में सोज़ का होना। उन्होंने ग़ज़ल के वही शेर चुने जिनमें उदासी, टूटन, बैचैनी और द्वंद्व है। सीधे सपाट शेर उन्होंने नहीं चुने।

किताब में अलग अलग मिजाज़ की चीजों को अलग अलग अध्यायों में समेट गया है। जैसे यादें, संस्मरण, टिप्पणियां और दस्तावेज को अलग जगह दी गई है। उस अध्याय का नाम है, ‘कोई यह कह दे गुलशन गुलशन, लाख बलाएँ एक नशेमन’। इसमें विभिन्न संकलनों और इनसाइक्लोपीडिया से लिए गए अनुदित अंशों को शामिल किया गया है। इसमें विविध भारती के यूनुस खान, जानी-मानी लोक गायिका मालिनी अवस्थी व शास्त्रीय गायिका श्रुति सादोलिकर की बहुरंगी टिप्पणियों को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा महबूब ख़ान की फिल्म रोटी में उनके अभिनय तथा गायकी पर भी एक आलेख है।

यतीन्द्र की बातचीत उनकी चिर-परिचित शैली में विषय को धीरे-धीरे खोलती है। वे तसल्ली से अपने सवाल रखते हैं और उनका ही ठहरकर जवाब भी सुनते हैं। शांति हीरानंद बेगम की शिष्या थीं और इस बातचीत में ढेरों आत्मीय प्रसंगों के जरिए बेगम की शख़्सियत खुलती चली जाती है। इसी तरह से रीता गांगुली के पास भी बहुत से किस्से हैं। पहली बार मुलाकात कब हुई, उनके सिखाने का तरीका कैसा था और कई दिलचस्प प्रसंगों में रची-बसी है उनसे बातचीत।

हिन्दी में कला, रंगमंच और संगीत पर किताबों का चलन अभी भी कम है। यदि किताबें प्रकाशित भी होती हैं तो उनके प्रस्तुतितकरण में बहुत लापरवाही बरती जाती है। वाणी प्रकाशन ने इस किताब की साज-सज्जा पर जो मेहनत की है, वह ध्यान देने योग्य है। आकर्षक कवर के साथ-साथ भीतर ग्रामोफोन रिकार्ड्स के कवर सहित कई दुर्लभ चित्रों को शामिल किया गया है।

करीब 280 पृष्ठों की इस किताब को हिन्दी में ही नहीं किसी भी भाषा में बेगम अख़्तर पर लिखी सबसे बेहतरीन किताबों में शामिल किया जा सकता है। चाहे इसके लेख हों, चाहे सामग्री का संचयन, चाहे साज-सज्जा या फिर पूरी परिकल्पना- हर चीज में इस कदर मेहनत की गई है, जिसके कारण यह संपादित पुस्तक संग्रहणीय बन गई है। यतीन्द्र मिश्र ने अपनी पिछली पुस्तक ‘लता सुर गाथा’ से अपने ही लिए एक बड़ी लकीर खींच दी है, मगर इस किताब के बारे में निःसंकोच कहा जा सकता है कि अपनी गुणवत्ता और विषय की गहराई में यह ‘लता सुर गाथा’ से कम नहीं ठहरती।

किताबः अख़्तरीः सोज़ और साज़ का अफ़साना
संपादनः यतीन्द्र मिश्र
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन
मूल्यः 395/-
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