साहस भरे फैसले लेती हैं हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘अग्निलीक’ की स्त्रियां

ह्रषिकेश सुलभ का उपन्यास अग्निलीक

प्रज्ञा पाण्डेय

अग्निलीक उपन्यास का आरम्भ इस वाक्य से होता है ‘शमशेर साईं की हत्या हो गई थी…’ हत्या  सनसनाहट तो   पैदा करती है लेकिन इससे गाँव  के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के सूत्र  शुरू में ही दिखायी दे देते हैं । जिस तरह हत्या की तफ़्शीश और पड़ताल चल रही है स्पष्ट हो जाता है कि सब कुछ बहुत सी परतों के भीतर समा रहा है और यह कथा बिलकुल आसान नहीं है।

लगभग सत्तर वर्ष की काल अवधि में बिहार के ग्रामीण अंचल की राजनीतिक,सामाजिक जीवन की गतिविधियां और प्रकृति दूब की तरह उपन्यास की भूमि पर इस तरह छाई छोपी हुईं हैं कि कुछ और दिखाई नहीं देता।

इसमें, नदियों की धाराएं और किनारे हैं भाव और प्रेम के अनेक गुंजलक हैं और साथ ही अनेक स्त्रियां हैं।  यशोदा, रेशमा, मुन्नी बी, नाज़ बेगम, गुलबानो, रेवती आदि आदि अनेक सामान्य दिखाई देतीं स्त्रियां, ज्योतिपुंज सी दीपित होती हैं। स्त्रियाँ हर हाल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं और किसी भी हाल में वे क़दम पीछे नहीं रखतीं। ‘अग्निलीक’ की स्त्रियाँ लीक से हटकर,समाज की परवाह न करते हुए साहस से भरे फ़ैसले लेतीं हैं। अधिकतर वे विद्रोहिणी हैं। समाज की भयानक अव्यवस्था को सम्भालने के लिए इन स्त्रियों का विद्रोह और साहस बहुत आवश्यक लगाता है।

अकरम अंसारी की बीवी नाज़ बेगम जिनके दुखों की इंतिहा नहीं थी वे भी जिनके पास बोलने के लिए आवाज़ अपनी आवाज़ भी नहीं थी जिनको एक कोने में डालकर अकरम अंसारी ने दूसरी औरत कर ली थी ,वे भी अकरम अंसारी की गिरफ़्तारी के बाद इतना साहस बटोर लेतीं हैं अकरम की रखी औरत को मुन्नी बी घर से निकाल के ही चैन लेतीं हैं और टोला मुहल्ला साँस डकार भी नहीं लेता वो नाज़ बेगम के साथ है।

रेशमा का बहुरंगी किरदार तो  उपन्यास की जान ही है। यशोदा का विवाह- पूर्व का प्रेम उपन्यास में एक ख़ुशबू की तरह निरंतर अपना अहसास बनाए रहता है। इस उपन्यास में स्त्रियां वैसी ही हैं जैसी वे होतीं हैं लेकिन पढ़ते हुए लगता है कि वे पहली बार लिखी जा रहीं हैं ! उनके दुःख , दर्द और उनका साहस एकदम स्वाभाविक रूप में उपन्यास में उकेरा गया है।

स्त्रियों के जीवन-जतन को क्या पहली बार कहा गया! ऐसा तो बिलकुल नहीं है लेकिन लेखक की कलम  से वे इस तरह सजीव होतीं हैं जैसे ऐसी संवेदना के साथ वे पहली बार उकेरी गईं हैं। स्त्रियों की सहने और जूझने की अपार क्षमता समाज की धारा का रुख़ बदल देती है। स्त्रियां विषपायिनी हैं और  मौन या मुखर दोनों ही हालात में  चुनतीं, अग्निलीक ही हैं।

उपन्यास का अंत तो होता है लेकिन लगता है कि कथा अपने अंत से  दुबारा शुरू  हो गई है जैसे कि अपनी ही राख से दुबारा जन्म ले रही है। यह उपन्यास खत्म होकर भी खत्म नहीं होता। यह उपन्यास अनवरत गाया जाता हुआ लोक के  गीतों जैसा है जिनकी अनेक  ध्वनियां अनंत काल तक  वातावरण में गूंजती रहतीं हैं।